थक जाना फिर भी मत रुकना;जीवन है बढ़ते जाना,
अपनी पीड़ा अपने दुख को,दोस्त कहीं मत बतलाना।
राह न देगा कोई तुमको;सबकी अपनी चालें हैं,
सबसे है आसान जगत में,अपने मन को समझाना।।
रिश्तों की जिस भूल भूलैया में;मन खोया रहता है,
उन रिश्तो के मन में अपना टाटा होया रहता है।
सोच-समझ कर दौड़ो हिरना;रेत लगेगा पानी सम,
झूठी आस लगाए तुम बिन मौत कहीं मत मर जाना।।
फूल खिलेंगे उसे रस्ते पर; जिससे होकर वीर गए,
जो दुश्मन की छाती को,अपने नख-दंत से चीर गए।
धरती बंदन उनका करती;स्वयं पखारे चरण यहाँ,
जिसने सीखा है धरती की,सेवा में नित झुक जाना।।
-पंडित अनिल
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