कंधे पर बैग, आँखों में सपना,
हाथ में डिग्री, दिल में अपना,
चार साल का ये सफ़र निराला,
कहीं उजाला, कहीं अँधियारा काला।
कॉलेज हमारा टियर-3 कहलाता,
नाम सुनते ही सिस्टम मुस्कुराता,
“Placement कैसा है?” कोई पूछ जाए,
तो पूरा बैच चुप हो जाए।
कभी क्लास लगे, कभी न लगे,
कभी सर आएँ, कभी न आएँ,
कभी Attendance का डर सताए,
कभी खुद ही छुट्टी मन जाए।
“आज lecture होगा?” — बड़ा सवाल,
“नहीं भाई, आज फिर है कमाल!”
कैंपस में शांति, नोट्स में सन्नाटा,
फिर भी चार साल का सपना है प्यारा-सा।
Infrastructure भी अपना रंग दिखाता,
कहीं lab है, तो सामान नहीं आता,
कहीं computer है, तो net नहीं चलता,
कहीं net चलता है, तो system नहीं खुलता।
फिर भी दोस्ती का रंग निराला,
एक चाय में बनता पूरा हवाला,
कैंटीन की बातें, corridor की हँसी,
यही तो है कॉलेज की असली खुशी।
Pressure थोड़ा कम—ये सुख भी भारी,
न IIT का नाम, न placement की तैयारी,
ना हर दिन कोई rank की दौड़,
ना हर पल competition की होड़।
पर सच ये भी है—आज़ादी अधूरी,
जब campus में opportunity हो पूरी?
Enjoy करने को माहौल नहीं,
सीखने को resources भी गोल नहीं।
फिर placement season आता है,
हर चेहरा थोड़ा घबराता है।
Notice board पर एक नाम चमकता—
“Company आ रही है!” दिल धड़कता।
Resume बनता, बाल सँवरते,
कुछ aptitude के सवाल उभरते,
Technical round का सपना सजता,
हर कोई खुद को engineer समझता।
फिर company आती—आशा जगाती,
दो-चार सवाल पूछकर चली जाती।
कहती—“We will get back to you…”
और महीनों तक कोई खबर नहीं आती यूँ।
जो आती है, वो भी शर्त लगाती—
“इतना CGPA, इतना skill दिखाओ।”
हम कहते—“मैडम, मौका तो दो!”
वो कहती—“Experience लेकर आओ।”
अरे भाई!
Experience कहाँ से लाएँ?
पहली नौकरी में ही तो पाएँ!
नौकरी बोले—“पहले experience,”
Experience बोले—“पहले नौकरी,”
बीच में खड़ा B.Tech वाला,
सोचे—“मेरी गलती थी क्या सारी?”
चार साल किताबों में बीते,
कुछ concepts जागे, कुछ सोए-रीते,
Degree हाथ में आ जाएगी,
पर नौकरी कहाँ से आएगी?
घर वाले पूछेंगे—
“बेटा, अब आगे क्या करना है?”
मन अंदर से धीरे बोले—
“पहले ये बताओ… करना क्या है?”
किसी का सपना PSU का,
किसी का सपना M.Tech,
किसी का सपना सरकारी नौकरी,
किसी का सपना foreign tech।
कोई GATE की राह पकड़ता,
कोई SSC का form भरता,
कोई coding सीखने बैठता,
कोई LinkedIn पर भविष्य ढूँढता।
कोई कहता—“Central competition दे दूँ?”
कोई कहता—“GATE ही कर लूँ?”
कोई बोले—“Job ढूँढूँ पहले?”
मन बोले—“भाई, कुछ तो कर लूँ!”
लेकिन कहानी इतनी काली भी नहीं,
हर सुबह इतनी खाली भी नहीं।
टियर-3 बस एक जगह का नाम है,
अंत नहीं—ये तो एक मुकाम है।
अगर campus रास्ता नहीं दिखाता,
तो बाहर का संसार बुलाता।
अगर placement cell सो जाता है,
तो student खुद जाग जाता है।
जिसके पास lab कम है—वो घर में बनाता,
जिसे mentor नहीं—वो Internet से सीख जाता।
जिसे company नहीं—वो project बनाता,
जिसे interview नहीं—वो खुद को आज़माता।
क्योंकि college हमारी सीमा हो सकता है,
हमारी क्षमता नहीं।
कभी कट्टी, कभी मिट्टी,
कभी हँसी, कभी ज़िम्मेदारी,
कभी दोस्तों संग बेफ़िक्री,
कभी भविष्य की बीमारी।
यही तो B.Tech की कहानी है—
थोड़ी हँसी, थोड़ी परेशानी है।
कुछ मिला, कुछ छूट गया,
कुछ समझा, कुछ टूट गया।
पर चार साल बाद जब पीछे देखेंगे,
तो शायद यही दिन सबसे प्यारे लगेंगे।
क्योंकि हमने सिर्फ syllabus नहीं पढ़ा,
हमने खुद को भी थोड़ा-थोड़ा गढ़ा।
तो ऐ टियर-3 के इंजीनियर,
डर मत अपनी पहचान से,
कॉलेज छोटा हो सकता है,
सपना नहीं।
Placement आए या न आए,
Company चुने या ठुकराए,
Campus मौका दे या न दे,
तू खुद को मौका देता रह।
GATE हो, सरकारी परीक्षा हो,
Private job हो या startup की राह,
Central competition हो या अपनी मेहनत—
रास्ते बहुत हैं, बस रुकना मत।
क्योंकि आखिर में डिग्री नहीं पूछेगी—
“तू किस टायर कालेज में पढ़ा था?”
ज़िंदगी पूछेगी बस इतना—
“जो हालात मिले थे तुझे,
उनसे तूने क्या बनाया था?”
और शायद उस दिन
टियर-3 का वही लड़का मुस्कुराएगा,
जिसके कैंपस में कंपनी नहीं आएगा
पर फिर भी अपनी प्लेशमेंट खुद हीं लगाएगा।
~ऋतुराज
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