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मंज़िलों से शिकायत नहीं.....

                
                                                         
                            मंज़िलों से शिकायत नहीं, बस रास्तों का अफ़सोस रहा,
                                                                 
                            
जो पाया वो कम न था, जो खोया वो भी ख़ास रहा।

हर मोड़ पर कुछ लोग मिले, कुछ धूप बने, कुछ छाँव बने,
दो पल जो साथ ठहर गया, सदियों तक उसका एहसास रहा।

वक़्त ने जितने ज़ख़्म दिए, उतने ही जीने के फ़न भी दिए,
हर दर्द की तह में आख़िर, जीने का एक विश्वास रहा।

चेहरे रोज़ बदलते देखे, रिश्तों के भी रंग बदले,
नफ़रत के इस मौसम में भी, दिल पर प्यार का लिबास रहा।

कुछ ख़्वाब अधूरे छूट गए, कुछ पूरे होकर टूट गए,
जो हाथों से छूट गया, वही रूह के सबसे पास रहा।

अब पीछे मुड़कर देखता हूँ, कोई शिकवा बाक़ी ही नहीं,
जो कुछ भी था, जैसा भी था, बस वही मेरा इतिहास रहा।
— अमित ममगाईं
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3 महीने पहले

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