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उम्मीद की रोशनी

                
                                                         
                            उम्मीद की वह रोशनी
                                                                 
                            

तुम्हारी दुआओं ने बचा लिया है मुझको,
वरना मैं भी कहाँ इतना संभल पाया था।
मानो या न मानो, ख़ुद को थामा है मैंने,
मगर हर बार तुम्हारी उम्मीद ने मुझे उठाया था।

ज़िंदगी ने जब-जब अँधेरों में धकेला,
तुम्हारी दुआ बनकर कोई उजाला साथ रहा।
जब अपने ही कदमों पर यक़ीन डगमगाया,
तुम्हारे विश्वास ने कहा—
“चलते रहो, अभी सफ़र बाकी है।”

बस उस एक उम्मीद की ख़ातिर
मैंने टूटकर भी ख़ुद को बिखरने नहीं दिया,
जिसमें तुमने कभी बेझिझक मुस्कुराकर
मेरे बेहतर कल पर भरोसा किया था।

शायद तुम्हें एहसास भी न हो,
तुम्हारी वह छोटी-सी मुस्कान
मेरे लिए किसी रब की निशानी थी—
एक मौन प्रार्थना,
एक अदृश्य सहारा,
और एक ऐसा विश्वास
जिसने मुझे फिर से ख़ुद से मिला दिया।

आज भी जब राह कठिन होती है,
मैं आसमान की ओर देखकर
बस इतना कहता हूँ
“हे प्रभु, उसकी दुआओं की लाज रखना,
जिसने मेरे टूटे हुए मन में
उम्मीद का दीप जलाया था।”

क्योंकि कुछ रिश्ते साथ चलकर नहीं,
दुआ बनकर जीवन सँवारते हैं…
और कुछ मुस्कुराहटें
केवल मुस्कुराहटें नहीं होतीं,
वे किसी की पूरी ज़िंदगी की
नई शुरुआत बन जाती हैं।
-आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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