बस तुम ही — मेरी रूह की पुकार
बस तुम ही, ख़ुदाया…
मेरी हर साँस में हो,
मेरी नस-नस में बहते हुए
मेरी रूह के एहसास में हो।
एक तुम ही तो हो,
जो मेरे सिवा सबके बस में हो,
फिर भी मेरे टूटे हुए ख़्वाबों में
उम्मीद बनकर बसते हो।
जब राहें थक जाती हैं,
जब हौसले बिखर जाते हैं,
तुम ख़ामोश होकर भी
मेरे भीतर दीप जलाते हो।
मैं गिरूँ तो उठने की ताक़त,
मैं रुकूँ तो चलने की चाह,
मैं हारूँ तो फिर लड़ने का जज़्बा—
तुम ही देते हो हर बार।
मेरी ख़ामोशी के अल्फ़ाज़ भी तुम,
मेरी तन्हाई का हमराज़ भी तुम,
मेरी मंज़िल की तलाश भी तुम,
और मेरी रूह की आवाज़ भी तुम।
बस तुम ही, ख़ुदाया…
मेरी नस-नस में रहना,
मेरी हर धड़कन को
अपने विश्वास से कहना—
“तू अकेला नहीं है,
तेरे भीतर मैं हूँ…
और जब तक मैं हूँ,
तेरी उम्मीद ज़िंदा है।”
-आचार्य अमित
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