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केवल धुएँ से उसकी पलकें भींगीं,

                
                                                         
                            अपनी बनाई हिस्से की रोटी परोस,
                                                                 
                            
वह त्याग में ढलती गई।
धीमी-धीमी आँच पर,
उसकी ख्वाहिशें जलती चली गईं।

सबकी ज़िंदगी अपनी-अपनी,
उसकी ज़िंदगी किसी और की।
आधी ज़िंदगी कहीं और,
बाकी ज़िंदगी कहीं और जी।

सपने की जगह कपड़े बुनते,
चूल्हे-चौके में वह खो गई।
सहनशक्ति की देवी धरती भी,
उसके हाल पर रो गइ।

केवल धुएँ से उसकी पलकें भींगीं,
यह न समझना कि वह रोई नहीं।
अब वह घर से बाहर निकलेगी,
उसकी घर कोई रसोई नहीं!

-अमित कुमार पांडेय"
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11 घंटे पहले

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