मुझमे अपनों का था मान,
आसमान को था अपनी ऊँचाई का गुमान।
ज़िद में आ गया मैं, छूने चला आसमान,
दौड़ते-दौड़ते पहुँचा वहाँ,
जहाँ ज़मीं के सिरे से मिलता दिखा आसमान।
पर जितना हाथ बढ़ाऊँ,
ये आसमाँ दूर क्यों चला जाता है?
क्या इसे झुकना नहीं आता?
या मेरी कोशिशों के बहाने, यह मेरा कद आज़माता है?
जो यह फलक मेरे पास नहीं आता, हर बार ठुकराता है,
पर दूर से हर बार, यह मेरे नज़दीक क्यों नज़र आता है?
यह आसमाँ अपनी हदों से बड़ा है,शायद यही बात यह मनवाता है,
पर मुझे भी अपने हौसलों के धागों से, सितारों को बाँधना आता है।
मैं गिरने से पहले संभलता हूँ, फिर नई राह चुनता हू
शायद मुझे ऊँचाई का नशा है,
या कोई अपना मुझे खींचता है, जो फलक के ऊपर और मेरे दिल में भी जा बसा है।
मैं भी अपने हौसलों की उड़ान को पंख दे आया हूँ,
इस फासले को मिटाने की एक ज़िद लेकर आया हूँ।
चाहत की डोर के सहारे, मैं मंज़िल तक पहुँचने आया हूँ,
आसमान को झुकने की ज़रूरत नहीं, मैं खुद के दम पर उठने आया हूँ
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