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आज भी इंसानियत का ज़माना है

                
                                                         
                            ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या,
                                                                 
                            
आँखों पे छाए कोहरे हैं।
अफसोस, जो धर्म के मोहरे हैं,
उन्हीं पर सत्य की मोहरें हैं।

हमें विषम परिस्थितियों के आगे झुकना नहीं आता,
टेढ़े-मेढ़े रास्तों में भी रुकना नहीं आता।
कामयाबी मिले न मिले, परवाह नहीं,
हमें धर्म-जाति की पहचान लेकर उठना नहीं आता।

हम नहीं आए हैं धर्म-जाति पर बँटने,
न हम आए हैं यहाँ धर्म-जाति का नारा रटने।

नए युग की क्रांति से हर अन्याय को मिटाना है,
देश हमारे लिए वह मिट्टी है जिसका कर्ज चुकाना है,
इंसानियत के हर फूल से इस गुलिस्ताँ को सजाना है।


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2 महीने पहले

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