कुछ तुझको लेकर के पक रहा है
जेहन ये मेरा महक रहा है
इधर सवेरे की पौ फूटती है
उधर ये अम्बर सरक रहा है
बंद है बोलचाल मुद्दतों से
कहाँ ये इतना फरक रहा है
वो अब्र घूंघट की आढ़ बन के
यूँ चांद को क्यों ढंक रहा है
उमर की ढेरों सी गर्द में से
बचपन का हिस्सा चमक रहा है
अभी जवानी नई है उस पर
इसीलिये वह बहक रहा है
है जुगनू कोई ये झुरमुटों में या
झुमका गेसुओं में दमक रहा है
लगे उसको ऐसा ही अक्सर
जहाँ ये आलोक को तक रहा है
-आलोक
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