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भार्गव राम खण्डकाव्य - 39

                
                                                         
                            समन्तपंचक ताल सभी,
                                                                 
                            
आप्लावित लाल रक्त से।
राम कर रहे श्राद्ध तर्पण,
निज पितरों का ताल से।।

दादा ऋचीक अरु पितर,
सभी प्रसन्न अब राम से।
आकाशवाणी हुई तभी,
ऋचीक कहहिं राम से।।

बन्द करो अब राम तुम,
श्राद्ध तर्पण आज से।
जाओ शीघ्र गिरि महेंद्र,
तप करो तुम आज से।।

आकाशवाणी जब सुनी,
निज दादा ऋचीक की।
जा पहुँच गये शीघ्र ही,
देखि रम्य चोटी महेन्द्र की।।

रम्य शिला वहाँ देखि राम,
रमे तभी उस शिला राम।
ध्यान मग्न हो गये थे राम,
थे बीत गये हजारों साल।।
 
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2 महीने पहले

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