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मेरी मिट्टी की आवाज़

                
                                                         
                            मैंने जब पहली बार
                                                                 
                            
दुनिया को समझना सीखा,
किसी किताब से नहीं,
माँ की आवाज़ से सीखा।

वह आवाज़,
जिसमें डाँट में भी अपनापन था,
ख़ामोशी भी एक कहानी,
और अधूरे शब्दों में भी
पूरा संसार बसा था।

वही तो हिंदी थी...

जो खेतों की पगडंडी पर
नंगे पाँव चलती है,
जो चूल्हे की आँच में
रोटी की ख़ुशबू बनती है।

जो दादी की कहानियों में
रातों को उजाला करती है,
जो पिता की चुप्पी में
अनकही बातें पढ़ती है।

हिंदी...
कभी तुलसी की चौपाई,
कभी कबीर की पुकार,
कभी विरह-पत्र की
भीगी हुई स्याही बनकर
हमारे भीतर उतरती रही।

हमने शहर बदल लिए,
लहजे बदल लिए,
कई नए शब्द अपना लिए...

पर कुछ शब्द
आज भी घर का दरवाज़ा खोलते हैं,
कुछ संबोधन
थके हुए मन पर
हाथ रख देते हैं।

भाषाएँ केवल बोली नहीं जातीं,
वे हमारे भीतर
धीरे-धीरे जीती रहती हैं।

और हिंदी...

वह किसी उत्सव की
एक दिन की रोशनी नहीं,
वह तो उस दीपक की लौ है
जो पीढ़ियाँ बदलने पर भी
घर के किसी कोने में
जलती रहती है।

माँ आज नहीं हैं...
पर उनकी सिखाई हुई हिंदी है,
जो आज भी मेरे भीतर
रक्त की तरह बहती है।

उनकी आवाज़ नहीं है,
पर उनके सिखाए हुए शब्द हैं,
उनके हाथों की छुअन नहीं है,
पर उन्हीं शब्दों में
आज भी उनका अपनापन है।

शायद इसी तरह
माँ कहीं जाती नहीं...
अपनी भाषा बनकर
हमारे भीतर रह जाती है। ❤️

और शायद इसीलिए
जब मैं हिंदी बोलता हूँ,
तो केवल शब्द नहीं बोलता,
उनकी दी हुई
एक पूरी दुनिया जीता हूँ।

जिस दिन कोई बच्चा
अपनी माँ को पुकारकर कहेगा—

“माँ, मुझे सब समझ आ गया...”

उस दिन भी
हिंदी कहीं न कहीं
अपना अर्थ लिख रही होगी।

किसी माँ की आवाज़ में,
किसी बच्चे की आँखों में,
किसी गाँव की मिट्टी में,
किसी पुराने घर की दीवारों में...

और किसी बेटे के भीतर,
जहाँ उसकी माँ नहीं होगी,
पर उसकी सिखाई हुई भाषा
हमेशा जीवित रहेगी। 
— अक्षय कुमार राजन 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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