नमन तुम्हें, हे पूज्य पिता!
नमन तुम्हें, हे ज्ञान-सुधा!
जीवन का तुमने मंत्र दिया,
सत्य-पथ का संबल दिया।
जब-जब मन संशय में डोला,
तुमने मेरा हाथ थाम बोला—
"सत्य कभी पराजित न होगा,
धर्म कभी लज्जित न होगा।"
विधि की पहली वर्णमाला,
तुमने ही मुझको पढ़वाई;
न्याय-दीप की प्रथम शिखा भी,
तुमने ही मन में जलवाई।
धाराएँ केवल शब्द न हों,
उनमें मानवता का मान रहे;
निर्बल की आँखों का आँसू,
हर निर्णय की पहचान रहे।
तुमने सिखलाया—
पद से पहले कर्तव्य रखो,
यश से पहले सत्य रखो;
जीवन यदि हो न्याय हेतु,
हर साँस को समर्पित रखो।
जब झूठ गरजकर चलता था,
सच चुपचाप सँभलता था;
तब तुमने निर्भय स्वर में कहा—
"सत्य अकेला चलता है,
पर अंततः वही विजयी होता है।"
आज जो मेरी वाणी में
न्याय का दृढ़ विश्वास है,
आज जो मेरी लेखनी में
संविधान का प्रकाश है,
यह मेरी उपलब्धि नहीं,
यह तुम्हारे तप का फल है;
मेरे जीवन का हर सम्मान,
पिता! तुम्हारे चरणों का बल है।
आओ, आज प्रण दोहराएँ—
अन्याय से कभी न डरेंगे,
सत्य-पथ से न हटेंगे;
विधि की गरिमा, राष्ट्र का मान,
जीवन भर हम रखेंगे।
मेरे गुरु, मेरे पथ-प्रदर्शक,
मेरे साहस, मेरे अभिमान—
पिता! तुम ही मेरी शिक्षा,
तुम ही मेरा स्वाभिमान।
वंदन! अभिनंदन! शत-शत वंदन!
मेरे प्रथम विधि-गुरु को बारंबार नमन!
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