जिस घर में माँ की हँसी गूँजे, वह घर मंदिर बन जाता है,
जिस सिर पर माँ का हाथ रहे, हर संकट खुद झुक जाता है।
मैं ऐसी माँ का बेटा हूँ, यह मेरा सबसे बड़ा सरोज है,
ममता की जीती-जागती प्रतिमा—मेरी माँ, मेरी सरोज है।
अहेरीपुर की पावन माटी में, एक कली मुस्काई थी,
भोली-भाली आँखों में जैसे, पूरी दुनिया समाई थी।
संस्कारों की धूप समेटे, जीवन-पथ पर चलती गई,
अपनों के सुख की खातिर हर पीड़ा हँसकर सहती गई।
फिर आया वह शुभ मंगल क्षण, जीवन ने करवट बदली थी,
सन् पचहत्तर की पावन बेला, नई डगर तब निकली थी।
सत्यनारायण का हाथ थामा, नारनौल को घर बनाया,
अपनेपन की ज्योति जलाकर, हर रिश्ते को दीप बनाया।
फिर ईश्वर ने चार रतन देकर, उसकी झोली भर डाली,
दीपक, भल्लू, रीतु, राजू—चारों में अपनी दुनिया पाली।
खुद के सपने पीछे छोड़े, बच्चों का संसार सजाया,
अपने हिस्से की धूप समेटी, सबको शीतल छाँव बनाया।
भल्लू जब भी पढ़ने जाता, माँ सबसे पहले जग जाती,
रोटी, सब्ज़ी, प्यार, दुआएँ—सब टिफ़िन में साथ सजाती।
वह टिफ़िन केवल भोजन न था, माँ का पूरा विश्वास था,
हर कौर में आशीष छिपी थी, हर कौर में आकाश था।
वह कहती—
"बेटा! मेहनत कभी न छोड़ना,
सच्चाई से जीवन जोड़ना।
जीत मिले तो विनम्र रहना,
हार मिले तो फिर से लड़ना।"
आज समझ में आता है हमको—
माँ की रसोई केवल रोटी नहीं पकाती,
वह तो चरित्र, संस्कार और भविष्य गढ़ जाती।
आज वही माँ मुस्काती है, पोते-पोती के संग खेलती,
बहू को बेटी मान हृदय से, हर पल खुशियों के दीप जलाती।
झुर्रियों में भी चाँद उतरता, आँखों में सावन रहता है,
जिस घर में माँ सरोज रहें, वहाँ सदा मधुबन रहता है।
यदि कभी जीवन में मुझसे पूछे कोई—
सबसे बड़ा धन क्या पाया है?
मैं कह दूँगा—
न महलों का वैभव पाया,
न सोने-चाँदी का श्रृंगार;
ईश्वर ने सबसे बड़ी दौलत दी—
"सरोज" जैसी माँ का प्यार।
आओ सब मिलकर शीश झुकाएँ,
माँ का यश संसार सुनाएँ।
जिसकी ममता से जीवन महका,
उसका ऋण हम कब चुकाएँ?
माँ, तू पहली प्रार्थना है,
माँ, तू पहला ज्ञान।
तेरे चरणों में झुकता है,
मेरा तन, मन और प्राण॥
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