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कितनी मुश्किल हुई होगी उसे नज़र फेरने में

                
                                                         
                            मुझे ढूंढ़ती रही है
                                                                 
                            

अधूरी ही रह जाएगी क्या दास्तां
आसमां जब भी देखा चांद आधा था

सोचता हु कोई मोहब्बत करूँ
उससा हो तब तो कोई बात करूं

वो चला गया है शहर यूं ही छोड़कर
अब खिड़की नहीं खुलती उसकी गली जाऊं तो

उससे कहना वो मेरे चिता पर ना आये
वो आये तो फिर मैं मर भी न सकूँगा

कितनी मुश्किल हुई होगी उसे नज़र फेरने में
जो आंखे ताउम्र मुझे खोजती रही है

- ऐ के गौतम
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

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