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इंक़लाब माँगेंगे

                
                                                         
                            ज़मीं पे बहते लहू का हिसाब माँगेंगे,
                                                                 
                            
हर एक टूटे हुए ख़्वाब का जवाब माँगेंगे।
हम फूल नहीं कि हर ज़ुल्म पर बिखर जाएँ,
हम नौजवान हैं, अपना इंक़लाब माँगेंगे।

जो छीनना चाहोगे, वही ख़्वाब बो देंगे,
हम वक़्त की मिट्टी में नए आफ़्ताब बो देंगे।
डर की हर एक दीवार को ख़ुद ढहा देंगे,
हम नौजवान हैं, नया इंक़लाब बो देंगे।

न हाथों में नफ़रत है, न दिल में इंतक़ाम,
हम सच की राह चलेंगे, यही है अपना पैग़ाम।
कलम से बदलेंगे हम हर दौर की तस्वीर,
इंसाफ़ की ख़ातिर हर सवाल का जवाब देंगे।

ये वक़्त गवाह होगा, ये इतिहास लिखेगा,
हर ज़ुल्म के आगे एक सच भी खड़ा दिखेगा।
जो सोचते हैं कि आवाज़ दब जाएगी कभी,
वो देखेंगे—यही कारवाँ फिर जनाब चलेगा।
— अजीत पड़वार "शहडोलिया स्याही"
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3 महीने पहले

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