ज़िंदगी की हर शाम, महफ़िल नहीं सजाती है,
हर सुबह कोयल की कूक, लेकर नहीं आती है।
हर आँगन में फूलों की, ख़ुशबू नहीं समाती है,
हर चेहरे पर ख़ुशियों की, मुस्कान नहीं आती है।
कभी धूप सताती है, कभी छाँव सुहाती है,
कभी आँखें हँसती हैं, कभी नमी भर जाती है।
कभी अपनों की बातें, दिल को बहलाती हैं,
कभी अपनों की ठोकरें, उम्रभर रुलाती हैं।
कुछ लतीफ़े हँसाकर, जीवन महका जाते हैं,
कुछ मीठे बोल भी दिल में, गहरे घाव दे जाते हैं।
कुछ पल सूनी राहों में, उम्मीद जगा जाते हैं,
कुछ पल हँसती दुनिया की, रौनक मिटा जाते हैं।
हर हँसी के पीछे, ख़ुशियों का संसार नहीं होता,
हर ख़ामोश चेहरे पर, दुख का इज़हार नहीं होता।
कई दर्द छिपे रहते हैं, मुस्कानों के साए में,
कई दीप जलते रहते हैं, आँधी और हवाओं में।
कभी वक़्त रुलाता है, कभी हँसाता है,
कभी गिराकर हमको, चलना सिखाता है।
हर ठोकर जीवन का, एक पाठ पढ़ाती है,
हर मुश्किल मंज़िल की, राह दिखाती है।
इसलिए ऐ मुसाफ़िर! हर पल मुस्कुराना,
ग़म आए तो भी उम्मीद का दीप जलाना।
जो बीत गया, उसको फिर लौटकर न पाना,
जो आज मिला है, उसे दिल से अपनाना।
हर शाम ढलेगी, हर सुबह मुस्कुराएगी,
पतझड़ के बाद फिर बहार भी आएगी।
ज़िंदगी कभी हँसाएगी, कभी रुलाएगी,
पर जीने की कला ही, इसे ख़ूबसूरत बनाएगी।
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