मैं तो तब से अब तक
उसी मोड़ पर खड़ी हूँ,
सनम…
तेरे इंतज़ार में।
उसी मोड़ पर,
जहाँ तुम मुझे छोड़कर गए थे,
यह कहकर—
"तुम यहीं मेरा इंतज़ार करना।
कुछ ज़रूरी कामों को अंजाम देकर
मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास लौट आऊँगा।
फिर तुम्हारे साथ
एक नया जहाँ बसाऊँगा।
जहाँ केवल हम और तुम होंगे,
हमारे और तुम्हारे अलावा
कोई और नहीं होगा।"
मैंने तुम्हारी हर बात पर
आँखें मूँदकर विश्वास किया।
सोचा था—
कुछ दिनों की दूरी होगी,
फिर उम्र-भर का साथ होगा।
मगर…
वह "कुछ दिन"
आज न जाने
कितने मौसमों में बदल गए।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X