"मित्र, जो शब्द स्वयं ही अपूर्ण है,
वह किसी का जीवन कैसे पूर्ण कर सकता है?"
यही प्रश्न बरसों से मन की देहरी पर बैठा है।
शब्दों का अपना आकार होता है,
पर रिश्तों का कोई माप नहीं होता।
नाम केवल पहचान देते हैं,
पर अपनापन जीवन को अर्थ देता है।
यदि पूर्णता ही प्रेम की पहली शर्त होती,
तो इस संसार में कोई संबंध जन्म ही न लेता।
हर इंसान कहीं न कहीं टूटा है,
हर मुस्कान के पीछे कोई अनकहा दर्द छिपा है,
हर आँख में कोई अधूरा सपना पलता है।
मित्र केवल एक शब्द नहीं,
वह विश्वास की धीमी लौ है,
जो अँधेरे समय में भी बुझती नहीं।
वह हाथ है, जो गिरने पर उठाता है,
वह मौन है, जो बिना बोले सब समझ जाता है।
पूर्ण तो केवल ईश्वर है,
मनुष्य तो अपनी कमियों के साथ ही सुंदर है।
दो अधूरे मन जब एक-दूसरे को स्वीकार कर लेते हैं,
तभी जीवन में पूर्णता का पहला दीप जलता है।
इसलिए शब्दों का अर्थ मत खोजो,
भावों की गहराई को पहचानो।
क्योंकि संबंध शब्दों से नहीं,
सच्चाई, त्याग, विश्वास और अपनत्व से जीवित रहते हैं।
यदि कोई तुम्हारी कमियों सहित तुम्हारा साथ निभा रहा है,
तो वही सच्चा मित्र है।
और यदि कोई केवल तुम्हारी सफलताओं का साथी है,
तो वह भीड़ का हिस्सा है, जीवन का नहीं।
याद रखना—
अधूरे शब्द कभी जीवन को पूर्ण नहीं करते
पर सच्चे भाव अवश्य कर देते हैं।
रिश्तों की सुंदरता पूर्णता में नहीं,
एक-दूसरे की अपूर्णताओं को प्रेम से स्वीकार करने में है।
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