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नहीं छीन सके हुनर हमारा.

                
                                                         
                            तुम सुख छीन लो मुझसे , मैं अब दुख संग रह लूंगी ,
                                                                 
                            
तुम अमृत पी लो , पी विष प्याला मैं जीवन जी लूंगी !
तुम अपने ऊँचे महलों में , सुरक्षित रह के दिखलाओ ?
मैं तूफानों के संग उड़कर , अम्बर छू के दिखलाऊंगी !

तुम पथ के दीप बुझा दो , पर मैं मंज़िल तक पहुचूंगी ,
मेरे सारे गीत छीन लो , मैं नये गीत रच तुम्हें सुनाऊंगी !
तुम अपने मानसरोवर में , आनंद मना के दिखलाओ ?
मैं दरिया संग बहकर भी , उस तट पहुंच तुम्हें बुलाऊंगी !

जग ने छीना मधुमक्खी से , उसका सारा मधु प्यारा
पर वो दुखी नहीं है अब भी , ये सोच कर जग हारा !
मैंने पूछा मधुमक्खी से—इतनी सुखी हो , तुम कैसे ?
वो बोली धीरे से—सुखी रहने का राज बहुत है गहरा ,
केवल तुमने मधु छीना , नहीं छीन सके, हुनर हमारा !
– अजय शोभने.
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8 घंटे पहले

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