वो भोर से पहले जागती है,
सपनों को हथेली पर सजाती है।
कंधों पर घर, मन में दफ़्तर,
हर दिन नई दुनिया बनाती है।
पग-पग पर काँटे बोती राहें,
फिर भी मुस्कान लिए चलती है।
अपने हिस्से का दर्द छुपाकर,
सबकी खुशियाँ ही बुनती है।
पर अफ़सोस इस दुनिया को,
इतिहास नहीं दिखाई देता।
उसके माथे का पसीना नहीं,
बस पर्स दिखाई देता।
चार शब्दों में तौल दिया जाता
"चल दी मैडम, पर्स टाँगकर।"
जैसे मेहनत का कोई मोल नहीं,
बस चलना ही अपराध हो।
किसी ने पूछा क्या संघर्ष था?
कितनी रातें जागी होगी?
कितने आँसू पीकर उसने,
जीवन की नाव सँभाली होगी?
नारी का सम्मान उसके
वस्त्रों, पर्स या चाल में नहीं;
उसके साहस, श्रम और स्वाभिमान में है,
उसकी हर जीत, हर कमाल में है।
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