दीवानों का हाल लिखूँगा,
चप्पल से बेहाल लिखूँगा।
प्यार की बातें ऐसी हैं,
मानो पउआ देशी है।
न हो के भी हो जाती,
नज़र कहीं खो जाती।
उनकी बात करें कैसे,
अरे! उनसे बात करें कैसे।
हम आए थे करने को पाठ,
अब नया पाठ पढ़ने लगे।
पल भर देख जिन्हें मोह गए,
उनका श्रृंगार हम गढ़ने लगे।
एक असाइनमेंट के कारण,
दो-दो नयना चार हुए।
मेरे मुख से उद्घाटित,
शब्दों के बड़े विचार हुए।।
हमने मन को समझाया,
कि तू क्षण भर को भरमाया।
परीक्षा के परिणाम दिवस,
फिर हमने उसको देखा।
एक सखी संग उनके थी,
वे थोड़ी चंचल भी थी।
बाहर जाने को ज्यों हम निकले,
त्यों रोक उन्होंने पूछ लिया—
परीक्षा का क्या परिणाम मिला,
कितने अंकों का हुआ योग।
हमने यथार्थ ही बतलाया,
फिर मन हमारे भी आया।
जब इन्होंने हमसे पूछा है,
तो हम भी पूछ ही लेते हैं।।
उन्होंने अंक जो बतलाया,
मेरे से ही मेल खाया।।
चले दिए हम सामान्य सोच,
हो सकता है, ये था संयोग।
फिर कोई न अन्य बात हुई,
न मिला बात का कोई संयोग।।
फिर कभी-कभी वो दिखती थी,
इतिहास की कक्षाओं में बस उन्हें देखने जाते थे,
दिखने न दिखने पर शेर नया एक गाते थे।।
उनसे न हम कुछ कह पाए,
भाव न सम्मुख बह पाए।
हमें उनको मित्र बनाना था,
कुछ सुनना, कुछ सुनाना था।
मुख्य विषय थे अलग-अलग,
पर एक विषय था, संधि-काल।
द्वितीय सेमेस्टर जब आया,
नए विषयों का समावेश।
फिर संधि-काल तत्काल गया,
बातों के बढ़ने का कारण न शेष।
अब आते-जाते दिख जाती थी,
वे कक्षाओं के प्रांगण में।
कभी ढूँढ़ते रह जाते हैं हम,
महाविद्यालय के आँगन में।।
मेरे मन का उन्हें ज्ञात नहीं,
कभी कुछ हमने भी कहा नहीं।
ये अनकही कहानी मेरी है,
सच उनसे कहने की देरी है।।
कुछ लोगों की बातें तो,
बिन कहे-सुने हो जाती हैं।
आते-जाते कहते-सुनते,
बातें फिर बन जाती हैं।।
दोनों तरफ मन मोद मिले,
अनगिनत रहस्य-शोध मिले।
पर अपनी एकतरफ़ा कहानी है,
मौन मोती, बंद सीप की वाणी है।।
-आदित्य दाहिया ‘आदि’
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