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सृजन मेरा

                
                                                         
                            चाहता हूं कुछ लिखूँ
                                                                 
                            
तुम्हारे लिए।
पर शब्द स्वयं ही
स्पष्ट तो नहीं होते।
बड़ा मुश्किल है
इन चन्द तुच्छ शब्दों से
तुम्हारा परिष्कार करना।
और मैं इतना
बहुज्ञ भी तो नहीं
कि कर सकूं
तुम्हारी संस्तुति।
निसंदेह तुम्हारा
ये ममत्व
अनिवार्य तो नहीं।
जीवन के रहस्यों से
पूर्ण परिश्रात मैं
जब तब छिप जाना चाहता हूं
आँचल में तुम्हारे।
"मां"
क्या करूं सृजित
तुम्हारे लिए,
तुम्ही ने तो किया है
सृजन मेरा।
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3 महीने पहले

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