मैं अपनी हार का चर्चा नहीं बनाऊँगा,
किसी भी ख़ौफ़ से चेहरा नहीं बनाऊँगा
मुझे पसंद नहीं बेवजह यूँ ही झुकना,
मैं अपना क़द कभी छोटा नहीं बनाऊँगा
अगर है भूख तो मेहनत से पेट भर लूँगा,
किसी के आगे तमाशा नहीं बनाऊँगा
मुझे जो दर्द मिला है, वही तो ग़ज़लें हैं,
मैं अपने ज़ख़्म को शोला नहीं बनाऊँगा
किसी के घर की तबाही पे जश्न क्या करना,
मैं अपने दिल में अँधेरा नहीं बनाऊँगा
हज़ार बार गिरूँ, फिर उठूँगा मिट्टी से,
मैं अपनी हार का किस्सा नहीं बनाऊँगा
किसी के ज़ख़्म का मरहम बनूँगा चुपके से,
मैं नेकियों का तमाशा नहीं बनाऊँगा
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