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चादर में छुपी

                
                                                         
                            चादर से ढक कर हम सोए, हौले-हौले आँखें रोईं।
                                                                 
                            
कोई देख ना ले यूँ हमको, ऐसी आस ना खोई॥
खाक सूखी है, गवाही दे रही नाकामी।
कर रहम, आँखों में भर आई है बेनामी॥
ये दिल...!
ये दिल...!
यूँ बदनामी की अब हो गई शुरुआत।
प्रेमी हो जाए, मानो तुम प्रेमी की बात॥
होंठों पर नाम है तुम्हारा,
जब देखते हो तुम, खिलखिला उठता है सारा॥
ये नशा है जो आपके पास है,
ये नफ़स है जो आपके पास है।
ले लो जहाँ, चाहे दे दो किसी को क्या पता,
हम ही बता दें क्या, क्या है हमारी खता?
प्यारी अखियों से नज़र ना हटाना,
पायल की रुनझुन से पिया को मनाना।
कोई आँचल तुमको कैसे छोड़े,
हर वफ़ा पे आपका नाम जुड़े॥
चादर से ढकी यादें तुम्हारी,
वादा है, आपकी ही रहेगी अर्ज़ी हमारी॥
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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