देह तप से ,
खुले आसमान में,
भरी दोपहर की रात,
कुछ गिले-शिकवे दे रहे।
हम देखते,
ग़म लालिमा,
चमक उठा सूरज,
देह तप रहा।
मुस्करा रही गली,
हवा में सांस आई,
ग़म सी,
देह तप से ,
खुले आसमान में।
- अभिषेक गुप्ता
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