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दोपहर की रात

                
                                                         
                            देह तप से ,
                                                                 
                            
खुले आसमान में,
भरी दोपहर की रात,
कुछ गिले-शिकवे दे रहे।
हम देखते,
ग़म लालिमा,
चमक उठा सूरज,
देह तप रहा।
मुस्करा रही गली,
हवा में सांस आई,
ग़म सी,
देह तप से ,
खुले आसमान में।

- अभिषेक गुप्ता
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15 घंटे पहले

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