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इश्क़ की ना-शुरुआत

                
                                                         
                            गुज़र रहा था हर एक परिंदा,
                                                                 
                            
वह हमने कब ठाना था...
उसके हाथों में जैसे कोई तिनका हो!

वह समझ न सके कि मैं क्या चाहता हूँ,
वह उफ़ कर-कर टाल देते हैं...

हमें मालूम था इस मंदिर की महफ़िल में,
प्यार का बीज कैसा बोया हूँ मैं,
ना जाने इस महफ़िल में अब कौन चाहेगा,
और एहसास की वादियों में डालेगा हमको...

इन गंगा के किनारों में डूबा हुआ मैं,
कैसे सीखूँ रे...
ना जाने ये आशिक़ी का पर्दा मुझसे हटा ही क्यों है?

इश्क़ की ना-शुरुआत का गहरा रंग हो,
हमने तो हर एक तरफ़ अपना प्यार देने की कोशिश की,
गिरा डाला हर एक मोहब्बत की वादी में...
पर किसने हमें देखा है?

हम तो यूँ ही बेनक़ाब होते जा रहे हैं इस पर्दे में,
और क्या जाने... हयात क्या है!
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3 घंटे पहले

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