आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़ज़ल

                
                                                         
                            धड़कनों पर रूह पर ऐसा कहर बरपाएगा।
                                                                 
                            
देख लेगा जब मुझे सब कुछ सिफ़र कर जाएगा। 1

ज़िंदगी के गीत का मुखड़ा लिखा है अब तलक,
उसके आ जाने से पूरा अंतरा हो जाएगा। 2

ख़त लिखूंगा मैं शिकायत से भरे लहज़े में जब,
कुछ रहम तो खाएगा कब तक भला तड़पाएगा। 3

ज़िंदगी के इस सफर की रात काली ही सही,
वो अगर मिल जाएगा मुझको सहर दिखलाएगा। 4

काफ़िये में दिल, रदीफ ए ज़िंदगी उसको लिखा,
लब का नुक्ता डालकर सब बे बहर कर जाएगा। 5

शाम हो साक़ी भी हो प्याला भी हो महफ़िल भी हो,
हुस्न तेरा मुझको सबसे बे-ख़बर कर जाएगा। 6

हाथ छोड़ेगा वो सागर फ़िर न आने के लिए,
दोनों आंखों को मेरी बस तर बतर कर जाएगा। 7
- अभिषेक गुप्ता "सागर"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर