आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कोर्ट में आशिक़ी

                
                                                         
                            न्यायालय में न्यायाधीश ने चश्मा उठाकर देखा,
                                                                 
                            
वकील साहब खोए थे, बदल चुकी थी रेखा।
माहौल बड़ा अटपटा था, कोर्ट में सन्नाटा छाया था,
जैसे वकील साहब ने ज़हरीला लड्डू खाया था।
न्यायाधीश महोदय झल्लाए, बोले— "मियां, कुछ तो बोलो!मुकदमा आगे बढ़ाओ, अपनी फाइल तो खोलो!
"वकील साहब ठंडी आह भरके बोले— "हुज़ूर,
क्या खाक केस लड़ें,बाहर गलियारे में दो आशिक हैं खड़े।बिना बंदूक और गोली के ही, दोनों बेचारे मारे गए,
शादी का झांसा देकर, कोर्ट मैरिज की अर्जी दे गए।
अब फैसला आप ही करो माई-बाप, इन्हें जेल भेजें या ससुराल,
दोनों प्यार में शहीद हुए हैं, कोर्ट फीस का भी है बुरा हाल!"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
13 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर