तरानों में बहकर हम,
यादों के गलियारों में फिसल गए,
फिर भी क्या अनूठा हौसला था,
हमारी अपनी ही मुलाकातों में।
हल्का सा दर्द उठा ज़रूर,
पर हम फिर बेफ़िक्र हो गए,
न जाने कितनी खामोशियाँ,
हम खुद ही खुद से चुरा ले गए।
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