" बिटिया के पँख"
माँ तुम जरूर बतला देना
मेरी छोटी का माँ बन जाना ...
इक इक पल कटता मुश्किल से
दिल चाहे मौसी बन जाना ।
एक बेटी ने है जन्म लिया
ले अब में नानी बन बैठी ...
मौसी मिलने आये गी कब
पूछे मुझ से रोज तेरी छोटी ।
उड़ के मैं आयी उस के पास
उस के कोमल छोटे से हाथ ...
मेरी छोटी सी ये प्यारी तितली
करने लगी है हर दिल पे राज ।
पापा की लाड़ली और प्यारी
अपनी मम्मी से बहुत न्यारी ...
इस को गोदी जब वो ले लें
पूरी हो दुनिया उन की सारी।
समय के संग ये पींग बड़ा
एक दिन मेरे घर उड़ आयी ...
इतनी भोली,इतनी कोमल
मेरे मन को बहुत थी ये भाई ।
अन्तराल की इक ऊंची दीवार
हम दोनों के थी आ गई बीच...
कुछ बरसों बाद मिली इस से
भोली वैसी ही थी,पर मन उदास ।
अपने मन की कुछ बात करी
बातें करती और करती गई ...
आँखें अब भी थी हिरनी सी
दुखते पर उस के दिल के तार ।
सुन उस से,उस की ऐसी व्यथा
आँसू अंखियों में भर आते थे ...
अपमान का विष वो पीती रही
होंट उस के सदा ही मुस्काते थे ।
कुछ संस्कार जो थे उस को मिले
कुछ डर था समाज बेदर्दी का ...
जो गलती उस की थी ही नहीं
ढोती रही बोझ बिना करे गिला।
उस का कमाल उस की हिम्मत
एक नन्हा फरिश्ता देखता था ...
उस के आँचल को पकड़ पकड़
राह नई वो खोजता रहता था।
तकदीर से करती थी समझोता
नन्हे को वो बहुत बहलाती थी ...
नन्हे के मन में इस बढ़ते हुए
भय,डर को वो दूर भगाती थी।
एक दिन उस नन्हे फरिश्ते ने
ऐसा अद्भुत एक काम किया ...
अपनी माँ की बन कर हिम्मत
छोटा अपना बसेरा ढूंढ लिया।
मजबूरी के ये जो संस्कार
कैसे उस को थे हम ने दिए ...
खामोश रही वो सहती रही
उस की पीड़ा हम पढ़ ना सके।
कैसा ये समाज, हम हैं कैसे
क्या सोच के नियम बनाते हैँ ...
कब खोलें गे पिंजरों को हम
बिटिया को पँख लगा दें गे।
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