धरती ने ओढ़ी है चुनरिया हरी
फूलों से अपनी माँग भरी
सावन की रिमझिम फुहारें पड़ी
धरा नवयौवना सी है निखरी।
शिव -पार्वती जी के मंदिर भक्ति उतरी
कांवड़िए ने भरी गंगाजल से गगरी
सोमवार का दिन हो जाता खास
व्रत, पूजा-अर्चना की आस्था गहरी।
तीज-त्योहार बन जाता घर का प्रहरी
बाजारों की रौनक से चहकती नगरी
श्रृंगार में मेंहदी का स्थान होता खास
हँसी - ठिठोली संग गूंजे गीतों में कजरी।
प्रकृति अपने हरेक रूप में सजी-सँवरी
सावन के महीने में गूंज उठती है भजन लहरी
भक्ति के संग उत्सव, खुशी जीवन का आधार
सावन के झूले संग झूमे खुशियाँ सुनहरी।
- आभा दवे
ठाणे पश्चिम,मुंबई
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