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जहाँ वो है

                
                                                         
                            कहाँ सूरज चाँद कहाँ
                                                                 
                            
कहाँ धूप छाव कहाँ
अब प्रभात में ढल जाता है अरुण
इतना शीघ्र ये जायेगा कहाँ?
अब इन पौधों में पहले जैसी आभा कहाँ?
अब इन पुष्पों में पूर्व जैसी महक कहाँ?
इन फुलवारियों से रंग गया कहाँ ?
इतनी देर से ढूंढ रहा हूँ क्या तुमने देखा?
मेरा में कहाँ?
कुछ तो गुम सा गया है जिसके बिना सूना है जहां
और ये सब भी शायद वहीं मिले वो है जहाँ
वो है जहाँ
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2 महीने पहले

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