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अपना बनाया न करो

                
                                                         
                            यूँ लहराती ज़ुल्फ़ों से हमारा दिल चुराया न करो,
                                                                 
                            
महकती फ़िज़ाओं में इश्क़ का ज़हर मिलाया न करो।

तुम्हारी एक मुस्कान से साँसें भी बहक जाती हैं,
यूँ हर नज़र से हमें अपना बनाया न करो।

हम पहले ही क़ैद हैं तुम्हारी मोहब्बत की सलाख़ों में,
अब पलकों की कैद का नया फ़रमान सुनाया न करो।

अगर निभानी नहीं है उम्रभर की वफ़ा,
तो ख़्वाबों में आकर दिल यूँ बहलाया न करो।

हम संभल भी न पाएँगे तेरी बेरुख़ी के बाद,
यूँ मोहब्बत जगा कर फिर आज़माया न करो।

यूँ दिल को उम्मीदों की शमा दिखाया न करो,
अगर अपने नहीं हो, तो अपना बताया न करो।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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