झूठे हैं सब साज सजावट,
झूठे सब शृंगार!
सावन! मत आना इस द्वार।
यहाँ मिलन के गीत नहीं हैं, यहाँ न प्रेम कहानी,
यहाँ न रति के रंगमहल हैं, यहाँ न राजा रानी,
अँगुलियों से आशाओं के धागे कब से छुटे,
बादल, बरखा, झूले, कजरी सब है हमसे रूठे,
एकाकीपन सीख चुका मन,
नहीं माँगता प्यार!
बरखा! तुम मत छेड़ो हमको,अपनी पीर पुरानी,
तन भीगेगा बाहर बाहर, मन है रेगिस्तानी,
कोना कोना स्याह हुआ मन, कैसे दीप जलाऊ?
स्वर ही सारे रूठ गए हैं, कैसे गीत सुनाऊँ?
हरी चूड़ियाँ पहन-पहन कर,
देख चुकी सौ बार!
श्वेत श्याम है भाग्य हमारा, तेरे उत्सव धानी,
रंगमंच-सी ऋतुएँ बदलीं, बदली नहीं कहानी,
तुम उत्सव हो, यहाँ उदासी, क्या संबंध हमारा?
अर्थहीन हैं रंग तुम्हारे, आना व्यर्थ तुम्हारा,
इन आँखों की मौन व्यथा से
जाओगे तुम हार!
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