स्वप्न दुनियादार नहीं होते-
कल्पनाएं निर्मम नहीं हुआ करतीं,
अन्यथा सत्य की वेदी पर
बलि नहीं चढ़ा करतीं।
अन्यथा कभी नहीं होता कि
सत्य दु:स्वप्न हो जाता।
एक उम्र पार करती
आकांक्षाओं के भग्नावशेष बनने तक,
कब धुंधला जाते हैं खुली आंखों के दिवास्वप्न
उजाले को खबर नहीं होती।
तनकर खड़े दिखते अस्तित्व की
बेहद कमजोर बैसाखियां
नहीं बताती वह मोहक तस्वीर।
उधार की छत तले
विकलांग इच्छाएं पाले लोगों के
तड़कते जिस्म
पुलक नहीं पाते
कई-कई स्वप्न अधूरे छोड़ते प्रतिदिन,
थके हुए पैरों को मरुद्यान,
क्षितिज पर टंगा हुआ दिखता है।
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X