नवीन सी० चतुर्वेदी एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं। साहित्य-लेखन में चाहे विविध विधाओं का सृजन हो अथवा विभिन्न भाषाओं का, चतुर्वेदी जी की क़लम सबको साधती है। वे अलग-अलग भाषाओं-विधाओं में केवल लिखते भर नहीं, बल्कि पूर्ण अधिकार के साथ रचना करते हैं। हिन्दी की विभिन्न छंदबद्ध कविताएँ, उर्दू की अनेक विधाओं की काव्य रचनाएँ, ब्रज- गुजराती-मराठी की ग़ज़लें, चुटीले व्यंग्य लेख आदि इनकी सृजना में आकार पाते हैं। पिछले दिनों ऐसे प्रसिद्ध रचनाकार के साथ एक पत्रिका के संपादक एवं ख्यात ग़ज़लकार-समीक्षक के० पी० अनमोल को संवाद का अवसर मिला। प्रस्तुत है दोनों के बीच हुई बातचीत।
के० पी० अनमोल–आपका जन्म भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में हुआ, सो ब्रज भाषा में भी आपने ग़ज़लें कहीं, लेकिन गुजराती और मराठी जैसी भाषाओं में भी कैसे ग़ज़लें कहने लगे?
नवीन सी० चतुर्वेदी– सबसे पहले मैं आपका आभार व्यक्त करना चाहता हूँ कि आपने बात वहाँ से शुरू की, मतलब योगिराज कृष्ण से आरम्भ की, जिनके बिना मैं कुछ भी नहीं हूँ। मेरा परिवार तीनों लोकों से न्यारी मथुरा पुरी से है और हम अनेक पीढ़ियों से तीर्थ पुरोहित हैं, सो विश्वभर के तीर्थयात्री मथुरा में आते रहे हैं। मेरे पूर्वज मुख्य रूप से गुजरातियों के पुरोहित रहे हैं, इस कारण बचपन से ही गुजराती परिवारों के साथ बातचीत होने के कारण गुजराती आ गयी। मुम्बई में आया तो देखा कि जो लोग मराठी में बोलते हैं, उनका काम फटाफट हो जाता है, इस स्वार्थ के कारण मराठी सीखी। कालान्तर में यह जुड़ाव मुझे साहित्यिक गलियारों तक ले गया।
के० पी० अनमोल– यह बताइए कि साहित्य के सम्पर्क में कब और कैसे आना हुआ और लिखने की शुरुआत कैसे हुई?
नवीन सी० चतुर्वेदी– मुझे ठीक से याद है कि य-मा-ता-रा-ज-भा-न-स-ल-गा मुझे पूज्य पिताजी के श्रीमुख से ही सीखने को मिला था। पूज्य पिताजी भी भक्ति काव्य सिरजते रहते थे। हालाँकि उन्होंने उक्त सृजन को कभी साहित्यिक सृजन का भाग नहीं माना। इसके अलावा प्रभु कृपा से जो सौभाग्य मुझे प्राप्त है, उसका उल्लेख भी करना चाहूँगा। अनमोल भाई यह एक स्वीकार्य तथ्य है कि इस संसार में हम सभी DNA के माध्यम से पीढ़ियों के प्रवासी हैं। हर DNA अलग-अलग तरह से सुदीर्घ प्रवास करता है। कुछ पीढियाँ दरसन करती हैं, कुछ पीढ़ियाँ परसन करती हैं, कुछ पीढ़ियाँ सिरजन करती हैं, तब जाकर किसी एक के हिस्से में पताका लहराने का अवसर आता है। बिहारी सतसई के सिरजनहार महाकवि बिहारी की बिहारी सतसई की संस्कृत भाषा में काव्यात्मक समीक्षा जिन्होंने की थी, उनका नाम है कृष्ण कवि ककोर। ये मथुरा की ककोरनघाटी पर रहते थे। ककोरनघाटी पर रहने के कारण इनके नाम के आगे ककोर जुड़ गया। मेरा परिवार भी ककोर वंशी है, ककोरनघाटी से है। आज भी हम ककोर वंशज कहलाते हैं।
अब मैं दूसरी ईश्वरीय कृपा के विषय में बताता हूँ। मेरी पूज्य माताजी के पिताजी के पिताजी यानी दादाजी परम आदरणीय चतुर्भुज पाठक ‘कंज’ कवि जी भी मूर्धन्य कवि हुए हैं। मैंने बचपन में अपने सीनियर्स से सुना है (अच्छा ये वे सीनियर्स, जो कंज जी के कालखण्ड में बच्चे रहे) कि कंज जी यमक अलंकार के विलक्षण कवि हुए हैं। उद्धव शतक के सिरजनहार बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर जी सृजन सहायताओं के लिए जिन आदरणीय नवनीत जी के यहाँ अक्सर जाया करते थे, कंज जी उन नवनीत जी के शिष्य रहे। अफ़सोस कि कंज जी का साहित्य हम तक आ नहीं सका। मैंने हर सम्भव प्रयास कर के देख लिया, परन्तु उनका साहित्य मिल नहीं सका। उनके जो तीन छन्द मुझे मिल सके, उन्हें मैंने साहित्यम और कविता कोश पर सहेज लिया है। तो इस तरह जो कुछ भी साहित्यिक प्रयास मैं कर पा रहा हूँ, मेरे पूर्वजों की तपस्या का सुफल ही है।
के० पी० अनमोल– ऐसे समृद्ध साहित्यिक परिवेश में बड़े होते हुए वे कौनसी परिस्थितियाँ रहीं, जिन्होंने आपको साहित्य-सृजन की तरफ़ खींचा? सबसे पहले किस भाषा और किस विधा में रचना हुई?
नवीन सी० चतुर्वेदी– प्रश्न के पहले हिस्से का उत्तर देते हुए मैं कहना चाहूँगा कि दिव्यांग व्यक्तियों के जीवन में सब कुछ ठीक नहीं होता। बहुत बार उनके होंठ सिल कर रह जाते हैं और बस वहीं से सृजन के अंकुर फूटना आरम्भ हो जाता है। मुझे लगता है, आपके प्रश्न के पूर्वार्ध का यह उत्तर पर्याप्त होगा। अब उत्तरार्ध का उत्तर। सबसे पहला सृजन ब्रजभाषा में ही हुआ। सम्भवतः कोई दोहा होना चाहिए। इस समय याद नहीं आ रहा। साथ ही साथ हिन्दी और उर्दू (हिन्दुस्तानी) में भी तुकबन्दियाँ चलती रहीं। वर्ष 1996 में मित्र मुकेश और उनके भाई राजेश ने एक ऑडियो केसेट निकाली थी- 'मने मारी ब्रजयात्रा रोज याद आवै'। इस गुजराती केसेट में चौरासी कोस वाली ब्रजयात्रा का पूर्ण वर्णन है। उस समय लोगों ने लाइन लगाकर इस केसेट को ख़रीदा था। इस गुजराती केसेट के सृजन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। स्मृति के अनुसार मेरी पहली गुजराती रचना यही है। मराठी साहित्य से जुड़ाव उसके बाद की घटना होनी चाहिए।
के० पी० अनमोल– आपको ब्रज भाषा में ग़ज़लों के प्रवर्तन का श्रेय हासिल है। जानना चाहूँगा कि कैसे ख़याल आया ब्रजभाषा में ग़ज़ल कहने का?
नवीन सी० चतुर्वेदी- मैं जब भी ग़ज़ल कहता तो उसमें अक्सर ब्रज या हिन्दी का पुट आ जाता तो गुरुवर आदरणीय तुफ़ैल चतुर्वेदी जी दुलारते हुए कहते कि नवीन उर्दू में ब्रजभाषा की घालमेल मत करो, किसी ने अभी तक ब्रजभाषा में गज़लें कही नहीं हैं, आप चाहें तो अलग से ब्रजभाषा में ग़ज़लें कहा करें। बात आयी गयी हो गयी। यह वर्ष 2012 की बात है। हमने 'लफ़्ज़' पर तरही आरम्भ की। बहुत ही सफल आयोजन। अनेक बढ़िया कलाम निकले उन तरहियों में। चलते-चलते वर्ष 2013 में एक मिसरा-ए-तरह आया- 'अच्छा ये आप समझे हैं अच्छा यही सही'। जब कुछ होना होता है तो बस हो जाता है। मैंने आदरणीय गुरुवर से पूछा कि दादा इस मिसरे पर ब्रजगजल कहने का मन हो रहा है। दादा की अनुमति मिलते ही श्री गणेश हो गया और इस तरह पहली ब्रजगजल अक्तूबर-नवम्बर 2013 में सृजित हुई।
के० पी० अनमोल– ब्रजगजल कहते समय आपके सामने कौन-कौनसी चुनौतियाँ आयीं और उनका सामना किस तरह किया?
नवीन सी० चतुर्वेदी– पहली ब्रजगजल तो खेलते-कूदते हो गयी। उसके बाद आदरणीय शमीम अब्बास जी ने कहा कि एक ग़ज़ल कहने से क्या होता है, आगे भी कहो तब लोग मानेंगे। भ्रातृवत मित्र आदरणीय मयंक अवस्थी जी भी उत्साहवर्धन करते रहे। पहली ब्रजगजल तो हो गयी परन्तु अनमोल भैया, उसके बाद का प्रवास बहुत सरल नहीं था। पहले से कुछ मोडल्स अवेलेबल होते हैं तो उनके आलोक में नये काम किये जाते हैं। यहाँ तो पहले से कुछ मिसाल थी ही नहीं। जो भी होना था, पहली बार ही होना था। छन्द में प्रयुक्त भाषा को ग़ज़ल की ज़बान तक लाने में बहुत समय लगा। ग़ज़ल लायक ज़मीनें तलाशने में समय लगा। सब कुछ पहली बार हो रहा था। ट्रायल एंड एरर चल रहा था। ऐसा नहीं कि सभी उपहास उड़ाते थे, कुछ लोग पीठ भी थपथपाते थे परन्तु क्रिएटिव गाइडेंस उपलब्ध नहीं थी। शायद उनकी भी वही बाध्यता रही हो कि जो होना था, पहली बार होना था। लेकिन जो होना होता है न, हो ही जाता है और इस तरह ब्रजगजलों की पहली पुस्तक 'पुखराज हवा में उड़ रए हैं' वर्ष 2015 में प्रकाशित हुई।
के० पी० अनमोल– आपने ब्रज भाषा में न केवल ख़ुद ग़ज़लें कहीं, बल्कि एक पूरा दल खड़ा किया ब्रज ग़ज़लकारों का। अन्य व्यक्तियों को ब्रज-ग़ज़ल से जोड़ने के दौरान आपका अनुभव कैसा रहा?
नवीन सी० चतुर्वेदी– प्रश्न के पूर्वार्ध का उत्तर यह है कि जब पहली किताब आ गयी तो मयंक अवस्थी जी ने कहा कि बस आपने ब्रजगजल कह ली, इससे कुछ नहीं होने वाला। अगर आप चाहते हैं कि यह विधा दीर्घकाल तक विद्यमान रहे तो अन्य लोगों को भी इस दिशा में आगे आने के लिए प्रेरित करो। उनके परामर्श को शिरोधार्य करते हुए मैंने फेसबुक पर ब्रजगजलों के तरही आयोजन आरम्भ किये। पहले उर्मिला माधव जी उसके बाद सालिम शुजा अंसारी उसके बाद मदन मोहन शर्मा ‘अरविन्द’ और इन तीनों के साथ-साथ मंगलेश दत्त जी का सहयोग अविस्मरणीय है। बाद में तो अनेक साथियों ने सहयोग किया और इस तरह मेरे अतिरिक्त 12 अन्य यानी कुल 13 व्यक्तियों की ब्रजगजलों का साझा संग्रह वर्ष 2018 में प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में मैंने सभी के सहयोग को रेखांकित किया है। रेस्ट इज द हिस्ट्री।
प्रश्न के उत्तरार्ध के उत्तर में मैं यह कहना चाहूँगा कि पहली पुस्तक के प्रकाशन के बाद के या अन्य लोगों को जोड़ने संबंधी जो अनुभव हैं, अब उन पर चर्चा करना आवश्यक नहीं लग रहा। जो मिला है, वह अधिक संतुष्टिप्रद है। जो हो गया, सो हो गया। अब तो लगभग पचास लोग ब्रजभाषा में ग़ज़लें कह रहे हैं। मेरे अलावा मदन मोहन शर्मा ‘अरविन्द’ जी का भी एकल संकलन आ चुका है। कुछ अन्य साथी भी कतार में हैं।
के० पी० अनमोल– आप सहित उन सभी रचनाकारों को शुभकामनाएँ। यह बताएँ कि आप हिन्दी ग़ज़ल को कैसे परिभाषित करते हैं? और वर्तमान की हिन्दी ग़ज़ल को कैसे देखते हैं?
नवीन सी० चतुर्वेदी– धन्यवाद अनमोल भाई। जिसका हिन्दी में अनुवाद न हो सके, वह हिन्दी है और जिसका उर्दू में अनुवाद न हो सके, वह उर्दू है। बात आगे बढ़ाने से पहले मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि दुष्यन्त के पहले और दुष्यन्त के बाद के भी हमारे सभी आचार्यों के प्रयास महत्वपूर्ण हैं। यदि उन्होंने राह में पड़े हुए काँटे न हटाये होते, ऊबड़-खाबड़ रास्तों को समतल न बनाया होता, अवरोधों से जूझे न होते तो हमें जो सुगमता मिली है, नहीं मिली होती। हम नये काम पर फोकस रख पाये तो अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के प्रयासों के कारण। मैं सुविख्यात शायर दुष्यन्त की एक ग़ज़ल से एक मतला और दूसरी ग़ज़ल से एक शेर कोट कर रहा हूँ-
मत कहो आकाश में कोहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
________
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
अब आप स्वयं देखिए। विवेचना हो सकती है। टीका हो सकती है। व्याख्या हो सकती है। समीक्षा आदि भी हो सकती हैं। परन्तु न तो पहली दो पंक्तियों का हिन्दी में अनुवाद हो सकता है, न दूसरी दो पंक्तियों का उर्दू में तर्जुमा (लिप्यान्तरण नहीं) हो सकता है। क्योंकि पहली दो पंक्तियाँ हिन्दी की हैं और दूसरी दो पंक्तियाँ उर्दू की हैं। पूर्वाग्रह छोड़कर समझना चाहें तो बहुत ही सरल बात है कि यदि पंजाबी पंजाबी जैसी लगती है, गुजराती गुजराती जैसी लगती है, मराठी मराठी जैसी लगती है तो हिन्दी को भी हिन्दी जैसा लगना ही चाहिए। विशेषकर शायरी में. यदि किसी शेर को सुनकर हमको हिन्दी वाली फीलिंग नहीं आ रही तो वह हिन्दी कहाँ हुई? अब एक और बात, कई विद्वान कहते हैं कि हिन्दी और उर्दू में कोई अंतर है ही नहीं, सगी बहनें हैं, आदि-आदि इत्यादि। बड़ी अच्छी बात है। तब तो अलग-अलग अकादमियाँ, अलग-अलग संस्थाएँ, अलग-अलग बजट आदि की आवश्यकता ही क्या है? दोनों एक ही हैं तो एक ही संस्थान, एक ही अकादमी, एक ही बजट और नाम भी एक ही दे दीजिए। मगर जैसा कि हम जानते हैं कि ये दोनों अलग हैं तो दोनों के प्रारूपों पर काम होते रहने चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो इन दौनों में से किसी का भी हित होगा, इसमें संशय है। मैं तो सभी भाषाओँ की सेवा कर रहा हूँ। वैमनस्य का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। बात बस इतनी-सी है कि हिन्दी को हिन्दी जैसा लगना चाहिए। हाँ, इसके लिए लोगों को अपने-अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर आना होगा।
के० पी० अनमोल– आपकी हिन्दी ग़ज़लों में तत्समनिष्ठ शब्दों के साथ भी कविताई है, जो कि अन्य के साथ नहीं है, वह सायास है या अनायास?
नवीन सी० चतुर्वेदी– दोनों ही बातें हैं। आरम्भ तो अनायास ही से हुआ था, बाद के प्रयास सायास भी हुए। चूँकि आरम्भ ब्रजभाषा से हुआ और बाद में उर्दू शायरी के असर ने भी अपना काम किया, इसलिए हिन्दी ग़ज़लें कहते हुए मैं यथासम्भव नीरसता से बचते हुए रसीली एवं व्यंजनात्मक हिन्दी ग़ज़लें कह पाया। हालाँकि शोध अभी भी चल ही रही है। विशेषकर 'धानी चुनर' के बाद से मैं देख रहा हूँ कि मेरे अतिरिक्त अन्य लोग भी अब इस काम में जुट चुके हैं। प्रभु कृपा रही तो शीघ्र ही हिन्दी ग़ज़लों (देवनागरी लिपि में उर्दू ग़ज़ल नहीं) के एक अन्तर्राष्ट्रीय साझा संकलन पर काम करने की अभिलाषा है। शेष जो हरि इच्छा।
के० पी० अनमोल– आपने ग़ज़ल को गजल ही क्यों कहा, गीतिका-मुक्तिका आदि क्यों नहीं? क्या मतला, मकता, रदीफ, काफिया, शेर आदि को नया नाम देना चाहेंगे?
नवीन सी० चतुर्वेदी– स्वभाव किसी स्थापित लाइन को काटने के बजाय अपनी स्वयं की लाइन खींचने का रहा है। जिसको जो कहना है, उसे कहने के लिए वह स्वतंत्र है। मैं बस अपना पक्ष रख रहा हूँ। चाय हमारे लिए एक आयातित पेय पदार्थ है। हमने इस चाय को पूरी तरह से अपने रंग में रँग दिया है। अंग्रेजों के पुरखों ने भी नहीं सोचा होगा कि उनकी ब्लैक टी भारत में आकर काढा भी बन सकती है। हमने अंग्रेजों की चाय को अपनाया, उसका रंग-रूप भी बदल डाला मगर उसका नाम नहीं बदला। हाँ, अनेक नामकरण अवश्य हुए, जैसे कि अमदाबादी चाय, सुरती चाय, बम्बैया चाय, काठियावाडी चाय. अदरक की चाय आदि-आदि इत्यादि। तो ग़ज़ल और उसके अन्य तत्वों के नाम बदलने से क्या फ़ायदा? इसका भारतीयकरण होता रहा है और होता रहेगा। मैं ग़ज़ल को अपनी भाषा में कहना चाहता हूँ, अपने विषयों पर बात करना चाहता हूँ, समय सापेक्षता के अधिकतम निकट रहना चाहता हूँ और साथ ही ग़ज़ल को नारा बनाने के स्थान पर उसके मूल तत्वों करुणा-क्षमा-दया आदि से बिलगना नहीं चाहता।
के० पी० अनमोल– लोग कहते हैं कि ग़ज़ल तो बस ग़ज़ल होती है, हिन्दी या उर्दू ग़ज़ल का वर्गीकरण नहीं किया जाना चाहिए, क्या कहेंगे इस पर?
नवीन सी० चतुर्वेदी– बिल्कुल, बहुत से लोग ऐसा कहते रहे हैं बल्कि अभी भी कह रहे हैं। उनका कहना है कि ग़ज़ल तो ग़ज़ल होती है, हिन्दी या उर्दू नहीं। ऐसे व्यक्तियों से मैं निवेदन करना चाहूँगा कि तनिक रुककर सोचिए और बताइए कि फिर अरबी ग़ज़ल, तुर्की ग़ज़ल, उर्दू ग़ज़ल, पंजाबी-गुजराती-मराठी-तेलगू-तमिल ग़ज़ल आदि नामों को भी दरकिनार किया जा रहा है क्या? यदि नहीं तो मात्र हिन्दी ग़ज़ल के चोला धारण करने पर ही हो हल्ला किसलिए? ठीक है अब तक वैसा नहीं हुआ तो क्या हो गया? कुछ सौ साल पहले तो हवाई जहाज, टेलीफोन आदि भी नहीं थे, पर अब हैं न! कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना चाहिए। देखो भाई, हमारी रूटीन लेंग्वेज अब न हिन्दी है, न उर्दू, वह हिंगलिश होती जा रही है। साहित्य सृजन के समय और विशेषकर शेरो-शायरी में हम शब्द चयन समझ कर करते हैं। तो यदि हिन्दी ग़ज़ल कह रहे हैं तो उसमें हिन्दी के दर्शन हों, ऐसी मेरी अपेक्षा रहती है। बट अगेन, यह मेरा पक्ष है, अन्य साथी असहमत हो सकते हैं।
के० पी० अनमोल– आपके पक्ष में मजबूती है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह बताएँ कि आप हिन्दी- उर्दू- ब्रज- मराठी- गुजराती पाँच भाषाओं में ग़ज़ल कह रहे हैं। मन के सबसे क़रीब कौनसी है और क्यूँ? क्या आपकी नज़र में कोई अन्य व्यक्ति भी ऐसा कर रहा है?
नवीन सी० चतुर्वेदी– माँ-बाप कैसे कह सकते हैं कि कौनसा बच्चा उन्हें सबसे प्यारा है? अलग-अलग समय पर अलग-अलग कारणों से सभी बच्चे उन्हें कभी न कभी दी बेस्ट लगते ही हैं। जब जिसमें कोई बढ़िया शेर हो गया, जिसको बढ़िया सराहना मिल गयी, जिसके कारण सरताज बन गये या कुछ अन्य लाभ हो गया, उस समय वही दी बेस्ट है। आपकी दूसरी शंका के विषय में कहना चाहूँगा कि मेरे इर्द-गिर्द जो लोग हैं, उनके अनुसार भी अभी तक तो (हिन्दी– उर्दू– गुजराती– मराठी- ब्रजभाषा) पाँच भाषाओं में ग़ज़ल कहने वाला एकमात्र व्यक्ति मैं ही हूँ।
के० पी० अनमोल– विशेष भगवत्-कृपा है आप पर। ग़ज़ल की बहरों को लेकर आपका एक लेख बहुत चर्चित रहा है। यह लेख कब और क्यूँ लिखा गया? इसे लेकर हुई प्रतिक्रियाओं के क्या अनुभव हैं आपके?
नवीन सी० चतुर्वेदी– यह अनुभव आपके साथ भी हुआ है। अनेक व्यक्तियों के साथ हुआ है। जब हम ग़ज़ल के आँगन में कमर मटका रहे होते हैं, उस समय टोकने वाले तो बहुत सारे बिन बुलाये आ जाते हैं मगर सहायता माँगते ही उनमें से अधिकांश स्वयं भी असहाय दिखाई पड़ने लगते हैं। जो समर्थ होते हैं, उनके विशिष्ट व्यवहार के विषय में कुछ न कहना ही ठीक है। हर व्यक्ति किताबों तक नहीं पहुँच पाता। हर किसी तक किताबें नहीं पहुँच पातीं। जिन तक पहुँच भी जाती हैं, उनमें से से अधिकांश व्यक्ति पुराणों जैसी किताबों को बाँचने में असमर्थ सिद्ध होते हैं। मैंने सोचा क्यूँ न अधिक काम की बहरों को एक टेबुलाइज्ड फॉर्म में पेश किया जाय! इसी दौरान प्रसिद्ध छन्दाचार्य आदरणीय आर० पी० शर्मा जी द्वारा चिह्नित ग़ज़ल की प्रचलित 32 बहरों से साक्षात्कार हुआ। उसके बाद की कहानी तो आप सभी को पता है ही। प्रतिक्रियाएँ निन्यानवें प्रतिशत सकारात्मक रहीं। इस आलेख के कारण आज विदेशों में रह रहे भारतीयों की दुआएँ भी मिलती रहती हैं।
के० पी० अनमोल– निश्चित रूप से बहुत-से नए-पुराने ग़ज़लकारों का भला हुआ है उस आलेख से। एक ग़ज़लकार का कम से कम कितनी बहरों में ग़ज़ल कहना आवश्यक है? कब एक ग़ज़लकार, ग़ज़लकार होता है?
नवीन सी० चतुर्वेदी– जहाँ तक 'कितनी बहरों' वाली बात है तो अनमोल जी, यदि हम एक बहर में भी ठीक-ठाक ग़ज़ल कहने लगें तो वह भी बड़ी बात है। जब एक प्रारूप में हाथ बैठ जाय उसके बाद ही दूसरे प्रारूप को हाथ लगाना चाहिए। दूसरी बात कि एक ग़ज़लकार, ग़ज़लकार कब होता है, के विषय में मुझे ऐसा लगता है कि यदि हमारा एक शेर भी अपरिचितों की जिह्वा पर आसन जमाने में सफल है तो हम ग़ज़लकारों की ड्यौढी पर मत्था टेकने के योग्य बन गये। यहाँ ध्यान रहे कि आज की सोशल मीडिया के ख़रीदे हुए लाइक-कमेन्ट-शेयर की तरह नहीं।
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