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यदि हिन्दी ग़ज़ल कह रहे हैं तो उसमें हिन्दी के दर्शन हों- नवीन सी० चतुर्वेदी

साहित्य
                
                                                         
                            नवीन सी० चतुर्वेदी एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं। साहित्य-लेखन में चाहे विविध विधाओं का सृजन हो अथवा विभिन्न भाषाओं का, चतुर्वेदी जी की क़लम सबको साधती है। वे अलग-अलग भाषाओं-विधाओं में केवल लिखते भर नहीं, बल्कि पूर्ण अधिकार के साथ रचना करते हैं। हिन्दी की विभिन्न छंदबद्ध कविताएँ, उर्दू की अनेक विधाओं की काव्य रचनाएँ, ब्रज- गुजराती-मराठी की ग़ज़लें, चुटीले व्यंग्य लेख आदि इनकी सृजना में आकार पाते हैं। पिछले दिनों ऐसे प्रसिद्ध रचनाकार के साथ एक पत्रिका के संपादक एवं ख्यात ग़ज़लकार-समीक्षक के० पी० अनमोल को संवाद का अवसर मिला। प्रस्तुत है दोनों के बीच हुई बातचीत।
                                                                 
                            

के० पी० अनमोल– आपका जन्म भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा में हुआ, सो ब्रज भाषा में भी आपने ग़ज़लें कहीं, लेकिन गुजराती और मराठी जैसी भाषाओं में भी कैसे ग़ज़लें कहने लगे?

नवीन सी० चतुर्वेदी– सबसे पहले मैं आपका आभार व्यक्त करना चाहता हूँ कि आपने बात वहाँ से शुरू की, मतलब योगिराज कृष्ण से आरम्भ की, जिनके बिना मैं कुछ भी नहीं हूँ। मेरा परिवार तीनों लोकों से न्यारी मथुरा पुरी से है और हम अनेक पीढ़ियों से तीर्थ पुरोहित हैं, सो विश्वभर के तीर्थयात्री मथुरा में आते रहे हैं। मेरे पूर्वज मुख्य रूप से गुजरातियों के पुरोहित रहे हैं, इस कारण बचपन से ही गुजराती परिवारों के साथ बातचीत होने के कारण गुजराती आ गयी। मुम्बई में आया तो देखा कि जो लोग मराठी में बोलते हैं, उनका काम फटाफट हो जाता है, इस स्वार्थ के कारण मराठी सीखी। कालान्तर में यह जुड़ाव मुझे साहित्यिक गलियारों तक ले गया।

के० पी० अनमोल– यह बताइए कि साहित्य के सम्पर्क में कब और कैसे आना हुआ और लिखने की शुरुआत कैसे हुई?

नवीन सी० चतुर्वेदी– मुझे ठीक से याद है कि य-मा-ता-रा-ज-भा-न-स-ल-गा मुझे पूज्य पिताजी के श्रीमुख से ही सीखने को मिला था। पूज्य पिताजी भी भक्ति काव्य सिरजते रहते थे। हालाँकि उन्होंने उक्त सृजन को कभी साहित्यिक सृजन का भाग नहीं माना। इसके अलावा प्रभु कृपा से जो सौभाग्य मुझे प्राप्त है, उसका उल्लेख भी करना चाहूँगा। अनमोल भाई यह एक स्वीकार्य तथ्य है कि इस संसार में हम सभी DNA के माध्यम से पीढ़ियों के प्रवासी हैं। हर DNA अलग-अलग तरह से सुदीर्घ प्रवास करता है। कुछ पीढियाँ दरसन करती हैं, कुछ पीढ़ियाँ परसन करती हैं, कुछ पीढ़ियाँ सिरजन करती हैं, तब जाकर किसी एक के हिस्से में पताका लहराने का अवसर आता है। बिहारी सतसई के सिरजनहार महाकवि बिहारी की बिहारी सतसई की संस्कृत भाषा में काव्यात्मक समीक्षा जिन्होंने की थी, उनका नाम है कृष्ण कवि ककोर। ये मथुरा की ककोरनघाटी पर रहते थे। ककोरनघाटी पर रहने के कारण इनके नाम के आगे ककोर जुड़ गया। मेरा परिवार भी ककोर वंशी है, ककोरनघाटी से है। आज भी हम ककोर वंशज कहलाते हैं।

अब मैं दूसरी ईश्वरीय कृपा के विषय में बताता हूँ। मेरी पूज्य माताजी के पिताजी के पिताजी यानी दादाजी परम आदरणीय चतुर्भुज पाठक ‘कंज’ कवि जी भी मूर्धन्य कवि हुए हैं। मैंने बचपन में अपने सीनियर्स से सुना है (अच्छा ये वे सीनियर्स, जो कंज जी के कालखण्ड में बच्चे रहे) कि कंज जी यमक अलंकार के विलक्षण कवि हुए हैं। उद्धव शतक के सिरजनहार बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर जी सृजन सहायताओं के लिए जिन आदरणीय नवनीत जी के यहाँ अक्सर जाया करते थे, कंज जी उन नवनीत जी के शिष्य रहे। अफ़सोस कि कंज जी का साहित्य हम तक आ नहीं सका। मैंने हर सम्भव प्रयास कर के देख लिया, परन्तु उनका साहित्य मिल नहीं सका। उनके जो तीन छन्द मुझे मिल सके, उन्हें मैंने साहित्यम और कविता कोश पर सहेज लिया है। तो इस तरह जो कुछ भी साहित्यिक प्रयास मैं कर पा रहा हूँ, मेरे पूर्वजों की तपस्या का सुफल ही है।

के० पी० अनमोल– ऐसे समृद्ध साहित्यिक परिवेश में बड़े होते हुए वे कौनसी परिस्थितियाँ रहीं, जिन्होंने आपको साहित्य-सृजन की तरफ़ खींचा? सबसे पहले किस भाषा और किस विधा में रचना हुई?

नवीन सी० चतुर्वेदी– प्रश्न के पहले हिस्से का उत्तर देते हुए मैं कहना चाहूँगा कि दिव्यांग व्यक्तियों के जीवन में सब कुछ ठीक नहीं होता। बहुत बार उनके होंठ सिल कर रह जाते हैं और बस वहीं से सृजन के अंकुर फूटना आरम्भ हो जाता है। मुझे लगता है, आपके प्रश्न के पूर्वार्ध का यह उत्तर पर्याप्त होगा। अब उत्तरार्ध का उत्तर। सबसे पहला सृजन ब्रजभाषा में ही हुआ। सम्भवतः कोई दोहा होना चाहिए। इस समय याद नहीं आ रहा। साथ ही साथ हिन्दी और उर्दू (हिन्दुस्तानी) में भी तुकबन्दियाँ चलती रहीं। वर्ष 1996 में मित्र मुकेश और उनके भाई राजेश ने एक ऑडियो केसेट निकाली थी- 'मने मारी ब्रजयात्रा रोज याद आवै'। इस गुजराती केसेट में चौरासी कोस वाली ब्रजयात्रा का पूर्ण वर्णन है। उस समय लोगों ने लाइन लगाकर इस केसेट को ख़रीदा था। इस गुजराती केसेट के सृजन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। स्मृति के अनुसार मेरी पहली गुजराती रचना यही है। मराठी साहित्य से जुड़ाव उसके बाद की घटना होनी चाहिए।
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2 घंटे पहले

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