Explainer: सोहराबुद्दीन केस क्यों चर्चा में, 21 साल में कैसे बदली दो एजेंसियों की निर्दोष और आतंकी वाली कहानी?
सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस में 22 आरोपियों के बरी होने के बाद मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि अभियोजन पक्ष कथित साजिश और फर्जी एनकाउंटर को पर्याप्त सबूतों से साबित नहीं कर पाया। अब सोहराबुद्दीन के भाई नयाबुद्दीन ने इस फैसले को चुनौती दी है। आखिर क्या था पूरा मामला और अब तक इसकी कहानी कैसे बदली? आइए जानते हैं…
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विस्तार
सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में नया मोड़ आया है। सोहराबुद्दीन के छोटे भाई नयाबुद्दीन शेख ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर बॉम्बे हाईकोर्ट के 7 मई 2026 के फैसले को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने 22 आरोपियों को बरी करके विशेष सीबीआई अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। अब नयाबुद्दीन ने इसी आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
यह मामला नवंबर 2005 का है। सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे। तीनों बस से यात्रा कर रहे थे। सीबीआई के अनुसार, 22 और 23 नवंबर 2005 की रात गुजरात और राजस्थान पुलिस की एक टीम ने तीनों को हिरासत में लिया था।
आखिर ये पूरा मामला क्या है? सोहराबुद्दीन शेख का एनकाउंटर क्यों हुआ था? इस में अब तक क्या-क्या हुआ? ताजा विवाद क्यों हो रहा है? आइये जानते हैं...
क्या है पूरा मामला?
जांच एजेंसी के मुताबिक, पुलिस ने बस को रोका और पहले तुलसीराम प्रजापति को बस से उतारा। इसके बाद सोहराबुद्दीन को बस से उतारा गया और कौसर बी भी उसके साथ नीचे उतर गईं। तीनों को अलग-अलग वाहनों में ले जाया गया। सोहराबुद्दीन और कौसर बी को गुजरात लाया गया, जबकि तुलसीराम को राजस्थान ले जाया गया। अभियोजन पक्ष का कहना था कि तीनों को एक लग्जरी बस से अगवा किया गया था।
सीबीआई की जांच के मुताबिक, तुलसीराम प्रजापति ने सोहराबुद्दीन को ढूंढने में पुलिस की मदद की थी। जांच में यह आरोप सामने आया कि पुलिस अधिकारियों ने तुलसीराम को भरोसा दिलाया था कि सोहराबुद्दीन को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा और उसे कुछ समय के लिए जेल में रखा जाएगा। इसी भरोसे के बाद तुलसीराम ने पुलिस को सोहराबुद्दीन के बारे में जानकारी दी।
कौन था सोहराबुद्दीन शेख?
सोहराबुद्दीन शेख मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के झिरन्या गांव का रहने वाला था। उस पर अवैध हथियार रखने और तस्करी, वसूली और हत्या जैसे कई गंभीर आपराधिक आरोप लगे थे। वह तुलसीराम प्रजापति के साथ मिलकर काम करता था। उसके खिलाफ गुजरात और राजस्थान के मार्बल कारोबारियों से कथित तौर पर वसूली करने के आरोप भी थे।
कैसे हुई सोहराबुद्दीन की मौत?
26 नवंबर 2005 को सोहराबुद्दीन अहमदाबाद में एक मुठभेड़ में मारा गया। एटीएस का दावा था कि उसके आतंकी संगठनों से संबंध थे और वह अहमदाबाद में एक बड़े राजनीतिक नेता की हत्या करने आया था। दूसरी ओर, सीबीआई की जांच में यह दावा किया गया कि सोहराबुद्दीन को लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी बताकर उसकी हत्या को पुलिस मुठभेड़ का रूप दिया गया था। हालांकि, यह अभियोजन पक्ष की थ्योरी थी। कौसर बी की हत्या की सही तारीख जांच में स्पष्ट नहीं हुई। जांच के अनुसार, उनका शव जला दिया गया। अभियोजन पक्ष ने उनकी मौत को भी कथित साजिश से जोड़ा।
तुलसीराम प्रजापति की मौत कैसे हुई?
तुलसीराम प्रजापति को इस मामले का अहम गवाह माना जाता था। वह उदयपुर की केंद्रीय जेल में बंद था। 18 दिसंबर 2006 को गुजरात पुलिस के अधिकारी वीएल सोलंकी ने उससे मिलने की अनुमति मांगी थी। उनका कहना था कि जांच में सामने आया था कि तुलसीराम सोहराबुद्दीन और कौसर बी के कथित अपहरण का गवाह हो सकता है। उन्हें उससे मिलने की अनुमति नहीं मिली।
इसके कुछ ही दिनों बाद 28 दिसंबर 2006 को तुलसीराम की कथित मुठभेड़ में मौत हो गई। पुलिस का दावा था कि उसने मिर्च पाउडर डालकर भागने की कोशिश की और बाद में गोली चलाने पर आत्मरक्षा में उसे मार दिया गया।
सीबीआई की थ्योरी के मुताबिक, सोहराबुद्दीन की हत्या के बाद पुलिस अधिकारियों को आशंका हुई कि तुलसीराम इस पूरे घटनाक्रम के बारे में जानकारी दे सकता है। इसलिए उसे संभावित गवाह मानकर खत्म करने की अलग साजिश रची गई।
सितंबर 2007 में तुलसीराम की मां नर्मदाबाई ने उनकी मौत की जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तुलसीराम प्रजापति के कथित मुठभेड़ मामले को सोहराबुद्दीन केस के साथ जोड़ दिया।
जांच की शुरुआत कैसे हुई?
सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन ने जनवरी 2006 में भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर एनकाउंटर की जांच की मांग की। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जून 2006 में प्रारंभिक जांच शुरू हुई।
मार्च-अप्रैल 2007 में मामला गुजरात सीआईडी को सौंपा गया। जांचकर्ताओं ने सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर को फर्जी बताया और आईपीएस अधिकारियों दिनेश एमएन, राजकुमार पांडियन और डीजी वंजारा को गिरफ्तार किया। बाद में अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया गया और चार्जशीट दाखिल हुई।
2010 में सीबीआई को मिली जांच
2010 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी। सुप्रीम कोर्ट ने तुलसीराम प्रजापति की मौत को सोहराबुद्दीन और कौसर बी की मौत से जोड़कर देखने और मामले में बड़ी साजिश की संभावना की जांच करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट के 2013 के फैसले में दर्ज सीबीआई की थ्योरी के मुताबिक, सोहराबुद्दीन को कथित तौर पर अगवा कर उसकी हत्या की गई और उसे एनकाउंटर का रूप दिया गया। सीबीआई ने कौसर बी की मौत को भी इसी कथित साजिश से जोड़ा था। तुलसीराम की हत्या को लेकर सीबीआई का आरोप था कि वह सोहराबुद्दीन के अपहरण और हत्या के बारे में जानकारी रखने वाला संभावित गवाह था।
सीबीआई ने आगे गिरफ्तारियां कीं, जिनमें गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह भी शामिल थे। उन्हें तीन महीने बाद गुजरात हाईकोर्ट से जमानत मिल गई।
उस समय मामले में कुल 38 आरोपी बनाए गए थे। 2014 से 2017 के बीच 16 लोगों को आरोप मुक्त कर दिया गया। इनमें अमित शाह, दिनेश एमएन, राजकुमार पांडियन, डीजी वंजारा और राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया भी शामिल थे।
सीबीआई की पहली चार्जशीट में तुलसीराम प्रजापति की हत्या को सोहराबुद्दीन और कौसर बी की हत्या से जुड़ी साजिश का हिस्सा बताया गया था। बाद में सीबीआई ने तुलसीराम की हत्या को संभावित गवाह को खत्म करने के लिए रची गई अलग साजिश के तौर पर भी पेश किया।
2012 में मुंबई ट्रांसफर हुआ मामला
2012 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गुजरात से बाहर ट्रांसफर कर मुंबई में सुनवाई का आदेश दिया। दोनों मुठभेड़ मामलों को भी एक साथ जोड़ दिया गया। 2014 में मामला मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत में पहुंचा। कई आरोपियों के डिस्चार्ज होने के बाद आखिर में 22 आरोपियों के खिलाफ ट्रायल चला।
2017 में शुरू हुआ ट्रायल
29 नवंबर 2017 को ट्रायल शुरू हुआ। शुरुआत में अदालत ने मीडिया को कार्यवाही की रिपोर्टिंग से रोक दिया था। नौ पत्रकारों की याचिका के बाद जनवरी 2018 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह रोक हटा दी।
सितंबर 2018 तक अभियोजन पक्ष की गवाही पूरी हो गई। कुल 210 गवाहों की जांच हुई, जिनमें 92 अपने पहले के बयानों से मुकर गए। नवंबर में सोहराबुद्दीन के भाइयों ने भी अदालत में बयान दिए।
21 दिसंबर 2018 को 22 आरोपी बरी
21 दिसंबर 2018 को मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया। विशेष सीबीआई जज एसजे शर्मा ने कहा कि अभियोजन पक्ष कथित साजिश साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेजी और ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी यह साबित नहीं कर सके कि मामला फर्जी एनकाउंटर का था। अदालत ने तुलसीराम प्रजापति की हत्या को साजिश का हिस्सा होने के आरोप को भी साबित नहीं माना।
अदालत ने सीबीआई की जांच पर भी टिप्पणी की थी। उसके मुताबिक, कथित साजिश साबित करने के लिए ठोस और दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किए गए और जांच का ध्यान सच्चाई तक पहुंचने के बजाय पहले से तय सिद्धांत को साबित करने पर ज्यादा था।
2019 में हाईकोर्ट पहुंचे सोहराबुद्दीन के भाई
विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन ने अप्रैल 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील की। उन्होंने फैसले को रद्द करने और दोबारा ट्रायल की मांग की। उनकी ओर से कहा गया कि विशेष अदालत के निष्कर्ष उपलब्ध सबूतों के विपरीत थे। उन्होंने यह भी कहा कि 92 गवाहों के मुकरने के बावजूद कई गवाहों के मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान या जांच अधिकारियों की ओर से वीडियो रिकॉर्ड किए गए बयान ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं किए गए। हाईकोर्ट ने 24 जून 2019 को अपील स्वीकार की। अंतिम सुनवाई दिसंबर 2025 में शुरू हुई और 16 जनवरी 2026 को पूरी हुई।
7 मई 2026 को हाईकोर्ट का फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 7 मई 2026 को 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि अभियोजन का मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, लेकिन इन साक्ष्यों की कड़ी में कई कमजोरियां थीं। आरोपियों को कथित एनकाउंटर से जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष सबूत भी नहीं था।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष सोहराबुद्दीन, कौसर बी और तुलसीराम के कथित अपहरण, उन्हें फार्महाउस में अवैध रूप से रखने और कथित फर्जी एनकाउंटर को साबित नहीं कर पाया। कथित फर्जी एनकाउंटर के पीछे साजिश भी साबित नहीं हुई।
अदालत ने हथियार से जुड़े सबूत पर भी सवाल उठाया। कोर्ट के मुताबिक, कथित अपराध में इस्तेमाल हथियार और सोहराबुद्दीन की जांघ से मिली गोली के बीच संबंध साबित करने वाला कोई सबूत नहीं था।
92 गवाहों के मुकरने पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए ट्रायल में गड़बड़ी नहीं मानी जा सकती कि अभियोजन पक्ष के 92 गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए। अदालत ने कहा कि सोहराबुद्दीन के भाइयों की गवाही प्रत्यक्षदर्शी की गवाही नहीं थी। अभियोजन के जिन गवाहों पर भरोसा किया गया, उनमें से भी कई ने अभियोजन के पक्ष का समर्थन नहीं किया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बरी किए जाने के फैसले में सिर्फ इसलिए दखल नहीं दिया जा सकता कि किसी मामले में दूसरा नजरिया संभव है। अदालत ने मामले को समग्र रूप से देखने और आरोपियों के पक्ष में मौजूद निर्दोषता की धारणा को ध्यान में रखने की बात कही। हाईकोर्ट ने उन 16 आरोपियों के पहले ही डिस्चार्ज हो जाने को भी महत्वपूर्ण माना और कहा कि इससे अभियोजन की साजिश वाली कहानी की बुनियाद कमजोर होती है। अब नयाबुद्दीन शेख ने बॉम्बे हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।