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‘मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई’: छात्र को नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार; ग्रेटर नोएडा में क्या हुआ?
Wed, 09 Sep 2026 12:14 PM IST
राकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Wed, 09 Sep 2026 12:14 PM IST
सुप्रीम कोर्ट में ग्रेटर नोएडा के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी नोटिस का मामला पहुंचा। शीर्ष अदालत के पहले के आदेश के बावजूद छात्र से पांच लाख रुपये के निजी मुचलके की मांग की गई थी। नोटिस बाद में वापस ले लिया गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई पर सख्त सवाल उठाए। अब संबंधित अधिकारी से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ग्रेटर नोएडा के एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई। मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के दूसरे वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जारी नोटिस से जुड़ा है। यह मामला वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने उठाया। उन्होंने बताया कि छात्र को पांच लाख रुपये के निजी मुचलके का नोटिस दिया गया था। वकील के मुताबिक, यह कार्रवाई तब की गई, जब सुप्रीम कोर्ट छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर रद्द कर चुका है और छात्रों के खिलाफ भविष्य में किसी भी तरह की जबरन कार्रवाई पर रोक लगा चुका है।
छात्र को नोटिस क्यों दिया गया?
चार सितंबर 2026 को जारी नोटिस में पुलिस रिपोर्ट का हवाला दिया गया था। पुलिस ने आरोप लगाया था कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे थे। उन पर छात्रों को कॉकरेच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए उकसाने का भी आरोप लगाया गया। पुलिस रिपोर्ट में कहा गया कि उनकी कथित गतिविधियों से काफी तनाव पैदा हुआ। इससे लड़ाई-झगड़े और शांति भंग होने की आशंका भी जताई गई थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने बीएनएसएस की धाराओं 126 और 135 के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार माना।
पांच लाख के मुचलके का क्या था मामला?
कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अक्षत त्रिपाठी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इसमें पूछा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए उनसे पांच लाख रुपये का निजी मुचलका क्यों न लिया जाए। इसके अलावा दो जमानतदारों से भी पांच-पांच लाख रुपये के मुचलके की मांग की गई थी। वरिष्ठ वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोटिस पर अमल होने वाला था। हालांकि, बाद में मामला प्रेस में आने के बाद इसे वापस ले लिया गया। वकील ने कहा कि अधिकारियों की ऐसी कार्रवाई छात्रों के बीच डर का माहौल पैदा कर सकती है।
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यह भी पढ़ें: गरबा पर घमासान: अमृता फडणवीस बोलीं- मुस्लिम आए तो गलत नहीं; राणे के बयान से क्यों बढ़ा विवाद?
नोटिस वापस लेने पर भी कोर्ट क्यों नाराज?
नोटिस वापस लिए जाने की बात पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि अब कार्रवाई का आधार क्या बचता है। इस पर वकील ने कहा कि नोटिस वापस लेने से कथित अवमानना खत्म नहीं हो जाती। उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट की गरिमा से जुड़ा मामला बताया। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बेहद सख्त टिप्पणी की। उन्होंने सवाल किया कि सुप्रीम कोर्ट के साफ आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी कर दिया। सीजेआई ने कहा, 'मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की? हमने साफ कहा था कि किसी छात्र के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं होगी। कोई मजिस्ट्रेट हमारे आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।'
सुप्रीम कोर्ट क्या करेगा?
चीफ जस्टिस ने वरिष्ठ अधिवक्ता से नोटिस को याचिका के जरिए रिकॉर्ड पर लाने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि वह संबंधित अधिकारी से इस कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण मांगेगा। यानी नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट अब यह देखेगा कि उसके पहले के आदेश के बावजूद छात्र के खिलाफ कार्रवाई किस आधार पर की गई। वकील ने इसे कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताया है।
ग्रेटर नोएडा में छात्र अक्षत त्रिपाठी को सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन में छात्रों को शामिल होने के लिए उकसाने के आरोप में नोटिस दिया गया था। नोटिस में पांच लाख रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों से पांच-पांच लाख रुपये की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर पहले ही रोक लगा रखी थी। नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद कोर्ट ने कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई और अधिकारी से जवाब मांगने के संकेत दिए।
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छात्र को नोटिस क्यों दिया गया?
चार सितंबर 2026 को जारी नोटिस में पुलिस रिपोर्ट का हवाला दिया गया था। पुलिस ने आरोप लगाया था कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच सरकार विरोधी और भ्रामक बातें फैला रहे थे। उन पर छात्रों को कॉकरेच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए उकसाने का भी आरोप लगाया गया। पुलिस रिपोर्ट में कहा गया कि उनकी कथित गतिविधियों से काफी तनाव पैदा हुआ। इससे लड़ाई-झगड़े और शांति भंग होने की आशंका भी जताई गई थी। इसी रिपोर्ट के आधार पर कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने बीएनएसएस की धाराओं 126 और 135 के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार माना।
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पांच लाख के मुचलके का क्या था मामला?
कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अक्षत त्रिपाठी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इसमें पूछा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए उनसे पांच लाख रुपये का निजी मुचलका क्यों न लिया जाए। इसके अलावा दो जमानतदारों से भी पांच-पांच लाख रुपये के मुचलके की मांग की गई थी। वरिष्ठ वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नोटिस पर अमल होने वाला था। हालांकि, बाद में मामला प्रेस में आने के बाद इसे वापस ले लिया गया। वकील ने कहा कि अधिकारियों की ऐसी कार्रवाई छात्रों के बीच डर का माहौल पैदा कर सकती है।
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नोटिस वापस लेने पर भी कोर्ट क्यों नाराज?
नोटिस वापस लिए जाने की बात पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा कि अब कार्रवाई का आधार क्या बचता है। इस पर वकील ने कहा कि नोटिस वापस लेने से कथित अवमानना खत्म नहीं हो जाती। उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट की गरिमा से जुड़ा मामला बताया। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बेहद सख्त टिप्पणी की। उन्होंने सवाल किया कि सुप्रीम कोर्ट के साफ आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी कर दिया। सीजेआई ने कहा, 'मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की? हमने साफ कहा था कि किसी छात्र के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं होगी। कोई मजिस्ट्रेट हमारे आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।'
सुप्रीम कोर्ट क्या करेगा?
चीफ जस्टिस ने वरिष्ठ अधिवक्ता से नोटिस को याचिका के जरिए रिकॉर्ड पर लाने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि वह संबंधित अधिकारी से इस कार्रवाई को लेकर स्पष्टीकरण मांगेगा। यानी नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट अब यह देखेगा कि उसके पहले के आदेश के बावजूद छात्र के खिलाफ कार्रवाई किस आधार पर की गई। वकील ने इसे कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताया है।
ग्रेटर नोएडा में छात्र अक्षत त्रिपाठी को सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन में छात्रों को शामिल होने के लिए उकसाने के आरोप में नोटिस दिया गया था। नोटिस में पांच लाख रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों से पांच-पांच लाख रुपये की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर पहले ही रोक लगा रखी थी। नोटिस वापस लिए जाने के बावजूद कोर्ट ने कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई और अधिकारी से जवाब मांगने के संकेत दिए।