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'रोजमर्रा के झगड़े मानसिक क्रूरता नहीं': हाईकोर्ट ने क्यों ठुकराई पति की तलाक की मांग, क्या है पूरा मामला?

Thu, 20 Aug 2026 05:11 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, मुंबई।
पीटीआई, मुंबई। Published by: राकेश कुमार Updated Thu, 20 Aug 2026 05:11 PM IST
सार
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पति-पत्नी के बीच सामान्य झगड़े और मतभेद क्या तलाक के लिए काफी हैं? बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ कहा कि नहीं। अदालत के अनुसार, मानसिक क्रूरता इतनी गंभीर होनी चाहिए कि दोनों से साथ रहने की उम्मीद करना ही उचित न रह जाए। सामान्य नोकझोंक और अलग-अलग घटनाओं के बजाय पूरे वैवाहिक जीवन को देखकर फैसला किया जाना चाहिए।
 

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routine marital disagreements not mental cruelty bombay high court rejects divorce plea
बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पति-पत्नी के बीच होने वाली सामान्य नोकझोंक और छोटे-मोटे मतभेद क्या मानसिक क्रूरता माने जा सकते हैं? बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने इस सवाल का जवाब देते हुए साफ-साफ कहा है कि केवल चिढ़, नाराजगी या रोजमर्रा के झगड़े तलाक का आधार नहीं बन सकते।
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हाईकोर्ट ने एक 44 वर्षीय व्यक्ति की तलाक की याचिका खारिज कर दी। व्यक्ति ने पत्नी पर अपने और मां के साथ झगड़ा करने तथा मानसिक क्रूरता करने का आरोप लगाया था। न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी फाल्के और न्यायमूर्ति राज वाकोड़े की पीठ ने बुधवार को दिए आदेश में कहा कि क्रूरता ऐसी होनी चाहिए, जिसमें पति-पत्नी से साथ रहने की उम्मीद करना उचित न रह जाए।
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सामान्य झगड़े को क्रूरता क्यों नहीं माना जा सकता?
उच्च अदालत ने कहा कि हर वैवाहिक जीवन में कुछ नोकझोंक और मतभेद होते हैं। इन्हें सीधे मानसिक क्रूरता नहीं कहा जा सकता। पीठ ने कहा कि क्रूरता का आकलन कुछ अलग-अलग घटनाओं के आधार पर नहीं होना चाहिए। इसके लिए पति-पत्नी के पूरे वैवाहिक जीवन को एक साथ देखना जरूरी है।
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हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि समय के साथ जीवन, वैवाहिक जिम्मेदारियों और रिश्तों की प्रकृति में बदलाव आया है। इसलिए एक मामले में जिस व्यवहार को क्रूरता माना जाए, जरूरी नहीं कि दूसरे मामले में भी वही स्थिति हो।

हाईकोर्ट की पीठ के अनुसार, यह भी देखना होगा कि पति-पत्नी किस तरह का जीवन जी रहे हैं। उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति क्या है। उनकी संस्कृति और जीवन में किन मानवीय मूल्यों को महत्व दिया जाता है।

यह भी पढ़ें: JPSC विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 11वीं-13वीं परीक्षा और नियुक्तियां रद्द करने के सरकार के आदेश पर रोक

पति ने पत्नी पर क्या-क्या आरोप लगाए?
दोनों की शादी 2003 में हुई थी। पति का कहना था कि पत्नी ने उसे और उसके माता-पिता को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। उसका दावा था कि पत्नी का स्वभाव गुस्सैल था। वह छोटी-छोटी बातों पर उसकी मां से झगड़ा करती थी। पति ने यह भी आरोप लगाया कि संतान न होने के लिए पत्नी ने उसे जिम्मेदार ठहराया। पति के मुताबिक, पत्नी 2011 में ससुराल छोड़कर चली गई थी।


पत्नी ने पति और ससुराल वालों पर क्या आरोप लगाए?
पत्नी ने पति के आरोपों से अलग कहानी बताई। उसका कहना था कि वह पति के घर वापस आई थी, लेकिन पति ने उसके साथ रहने से इनकार कर दिया। महिला ने आरोप लगाया कि संतान न होने के कारण पति और उसके परिवार के सदस्य उसके साथ बुरा व्यवहार करते थे।

इस मामले में पारिवारिक अदालत पहले ही पति को तलाक देने से इनकार कर चुकी थी। साथ ही उसे पत्नी को हर महीने 5,000 रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था। पति ने इसी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि तुच्छ मुद्दों पर लगाए गए आरोपों को क्रूरता नहीं माना जा सकता। केवल सामान्य आरोपों के आधार पर विवाह समाप्त करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
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