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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Kishau Project: Dam site and technology changed over 86 years; DPR finalized in 1988, know timeline

किशाऊ परियोजना: 86 साल में बदली बांध की जगह और तकनीक, 1988 में तैयार हुई डीपीआर, जानें कब क्या हुआ

Fri, 18 Sep 2026 05:30 AM IST
Krishan Singh अनिमेष कौशल, शिमला।
अनिमेष कौशल, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 18 Sep 2026 05:30 AM IST
सार
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 किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना की राह में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ मंजूरियां नहीं, बल्कि भूगर्भीय परिस्थितियां भी रही हैं। कभी बांध की तकनीक बदली तो कभी उसका पूरा स्थल ही बदलना पड़ा। करीब 86 साल की लंबी कवायद के बाद अब यह परियोजना अपने मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ने की स्थिति में पहुंची है।

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Kishau Project: Dam site and technology changed over 86 years; DPR finalized in 1988, know timeline
किशाऊ बांध परियोजना - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

 हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना की राह में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ मंजूरियां नहीं, बल्कि भूगर्भीय परिस्थितियां भी रही हैं। वर्ष 1944-45 में शुरू हुए सर्वे से लेकर 1988 की अहम डीपीआर और 1998 के संशोधन तक परियोजना की योजना कई बार बदली। कभी बांध की तकनीक बदली तो कभी उसका पूरा स्थल ही बदलना पड़ा। करीब 86 साल की लंबी कवायद के बाद अब यह परियोजना अपने मौजूदा स्वरूप में आगे बढ़ने की स्थिति में पहुंची है।

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किशाऊ बांध की सबसे पहली योजना 1940 में बनी
किशाऊ बांध परियोजना की सबसे पहली योजना वर्ष 1940 में बनी। आजादी से पहले तत्कालीन पंजाब सरकार ने वर्ष 1944-45 में प्रस्तावित स्थल का सर्वेक्षण कराया था। हालांकि वर्ष 1946 में सर्वे और जांच का काम अज्ञात कारणों से रोक दिया गया। करीब 16 साल बाद 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्वेक्षण और जांच दोबारा शुरू की। इसके बाद वर्ष 1964 में प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट तैयार हुई। इसमें करीब 235 मीटर ऊंचे ग्रेविटी आर्च बांध का प्रस्ताव रखा गया था। 

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1965 में चौथी पंचवर्षीय योजना में शामिल करने के लिए भेजा प्रस्ताव
इस प्रस्ताव को वर्ष 1965 में भारत सरकार को चौथी पंचवर्षीय योजना में शामिल करने के लिए भेजा गया। केंद्रीय जल आयोग की जांच के दौरान प्रस्तावित किशाऊ गांव के पास का स्थल प्रमुख भूगर्भीय फाल्ट से प्रभावित पाया गया। इसके बाद बांध की तकनीक पर ही सवाल खड़े हो गए। ग्रेविटी आर्च बांध की जगह रॉकफिल बांध बनाने का विकल्प सुझाया गया।

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1970 में फिर सर्वेक्षण और जांच की
इसके बाद उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने वर्ष 1970 में फिर सर्वेक्षण और जांच शुरू की। करीब आठ साल बाद 1978 में रॉकफिल बांध के प्रस्ताव के साथ नई डीपीआर तैयार कर केंद्रीय जल आयोग को भेजी गई। लेकिन भूगर्भीय जटिलताओं ने इस प्रस्ताव को भी आगे नहीं बढ़ने दिया। केंद्रीय जल आयोग ने प्रमुख फाल्ट और अन्य भूगर्भीय परिस्थितियों को देखते हुए मूल किशाऊ स्थल पर रॉकफिल बांध को भी उपयुक्त नहीं माना।

तीन नए स्थलों पर हुआ अध्ययन
मूल किशाऊ स्थल अनुपयुक्त पाए जाने के बाद परियोजना को बचाने के लिए वैकल्पिक स्थलों की तलाश शुरू हुई। केंद्रीय जल आयोग के निर्देश पर अटल, सांभरखेड़ा और मोरार स्थलों का विस्तृत भूगर्भीय अध्ययन कराया गया। जांच में सांभरखेड़ा स्थल को 236 मीटर ऊंचे कंक्रीट ग्रेविटी बांध के लिए उपयुक्त पाया गया। वहीं अटल और मोरार स्थल इस ऊंचाई के बांध के लिए उपयुक्त नहीं मिले।

1988 में बनी नई डीपीआर
सांभरखेड़ा स्थल की भूगर्भीय जांच के आधार पर वर्ष 1988 में नई डीपीआर तैयार की गई। इसके बाद उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने वर्ष 1998 में इसमें संशोधन किया और संशोधित रिपोर्ट को केंद्रीय जल आयोग के विचार के लिए भेजा। इस तरह करीब पांच दशक की सर्वेक्षण और तकनीकी जांच के बाद परियोजना की योजना मौजूदा स्वरूप की ओर बढ़ी।

2008 में मिला राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा
किशाऊ परियोजना को साल 2008 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया। इसके बावजूद इसका कार्यान्वयन लंबे समय तक लंबित रहा। 2014 में प्रधानमंत्री कार्यालय की पहल पर केंद्र और दोनों राज्यों के अधिकारियों की बैठक हुई। परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए उत्तराखंड और हिमाचल के संयुक्त उपक्रम के गठन पर जोर दिया गया। किशाऊ को धरातल पर उतारने के लिए हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सरकार के बीच 20 जून 2015 को संयुक्त उपक्रम बनाने का समझौता हुआ। इसके बाद 16 जनवरी 2017 को किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया गया। कंपनी को परियोजना के क्रियान्वयन के लिए विशेष प्रयोजन इकाई के रूप में बनाया गया।

किशाऊ बांध परियोजना में प्रदेश के हितों का सरंक्षण : विनय
 प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार ने भाजपा से सच्चे मन से केंद्र की मोदी सरकार से प्रदेश की बंद की गई आरडीजी बहाली के प्रयास करने को कहा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इसके लिए केंद्र की मोदी सरकार सहित प्रदेश भाजपा का भी आभार व्यक्त करेगी। विनय कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने जिस प्रकार से किशाऊ बांध परियोजना में प्रदेश हितों का सरंक्षण किया है, यह राज्य के लिए कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि साबित होगी। इसके लिए भाजपा को प्रदेश की कांग्रेस सरकार विशेष तौर पर मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू को बधाई देनी चाहिए। विनय कुमार ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर लोगों को गुमराह नहीं कर सकते। उन्होंने अपने कार्यकाल में इस परियोजना को लेकर कुछ नहीं किया। अब अपनी असफलता को छिपाने के लिए केंद्र सरंकार का आभार व्यक्त करने की बात कह रहे हैं। विनय कुमार ने जयराम ठाकुर से कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी ओर से घोषित आपदा राहत के 1500 करोड़ जारी करवाते हैं तो कांग्रेस इसका भी आभार व्यक्त करेगी। केंद्र की मोदी सरकार प्रदेश के हितों की अनदेखी कर प्रदेश के साथ बहुत बड़ा अन्याय कर रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के पास हिमाचल प्रदेश के कर्मचारियों के नेशनल पेंशन सिस्टम यानी एनपीएस के तहत जमा लगभग 9,280 करोड़ जो अटके पड़े हैं, उसे केंद्र सरकार प्रदेश को जारी करे। 

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