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विचार: नींव के पत्थरों का सच्चा सम्मान

Wed, 28 Oct 2026 08:59 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 28 Oct 2026 08:59 PM IST
सार
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पर्यटन विभाग द्वारा यहां स्थापित महर्षि वाल्मीकि की 12.5 फीट ऊंची भव्य कांस्य प्रतिमा और आश्रम का संपूर्ण विकास इस बात का प्रमाण है कि सरकार अपनी जड़ों की ओर पूरी निष्ठा से लौट रही है। 

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UP Government Yogi Adityanath Cultural Renaissance Maharishi Valmiki Opinion Article
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण तब तक अधूरा है, जब तक उन महापुरुषों और ऋषियों के तपोस्थलों को उनका उचित सम्मान नहीं मिलता, जिन्होंने इस देश की आत्मा को गढ़ा है। योगी सरकार की रणनीति अत्यंत स्पष्ट है। रामायण सर्किट और राम वन-गमन पथ के माध्यम से महर्षि वाल्मीकि से जुड़े प्रत्येक महत्वपूर्ण स्थल का कायाकल्प करना। इस पहल का सबसे प्रमुख केंद्र चित्रकूट के लालापुर स्थित वाल्मीकि आश्रम के रूप में उभर रहा है। यह वह तपोभूमि है, जहां महर्षि ने अपने ज्ञान और तपस्या से समाज को दिशा दी थी।
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पर्यटन विभाग द्वारा यहां स्थापित महर्षि वाल्मीकि की 12.5 फीट ऊंची भव्य कांस्य प्रतिमा और आश्रम का संपूर्ण विकास इस बात का प्रमाण है कि सरकार अपनी जड़ों की ओर पूरी निष्ठा से लौट रही है। इतना ही नहीं, एक भव्य पर्यटन सुविधा केंद्र का निर्माण अपने अंतिम चरण में है, जो भविष्य में दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ा केंद्र बनेगा। इस विरासत को सहेजने के लिए सरकार ने कई और परियोजनाएं आगे बढ़ाई हैं। वाल्मीकि घाट, परिक्रमा पथ और आरती स्थल जैसी परियोजनाएं स्वीकृत हैं। अयोध्या और इटावा के वाल्मीकि स्थलों के लिए वित्तीय प्रावधान किया गया है, कानपुर के बिठूर आश्रम का संरक्षण और अयोध्या के नए हवाई अड्डे का नाम महर्षि वाल्मीकि के नाम पर रखा गया है। इसके अलावा सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में दस-दस स्मारक बन रहे हैं, जिनमें महर्षि वाल्मीकि, संत रविदास, संत कबीर, बाबा साहेब आंबेडकर और महात्मा ज्योतिबा फुले की मूर्तियां होंगी।
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ये प्रयास सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, पर प्रतीकों की भी एक सीमा होती है। महापुरुषों की स्मृति को स्थायी बनाने का सबसे प्रभावी तरीका यह है कि जिस समाज के वे प्रेरणास्रोत रहे, उसके जीवन में ठोस सुधार आए। इस अर्थ में सफाई-मित्रों के लिए की गई घोषणाएं बड़ा कदम हैं। वाराणसी में स्वच्छता सेनानियों को सम्मानित करते हुए मुख्यमंत्री ने उन्हें नींव का पत्थर कहा, जो दिखता नहीं पर जिस पर पूरी इमारत टिकी होती है। यह उपमा अलंकार से अधिक एक तथ्य का बयान है। सार्वजनिक स्वास्थ्य, महामारियों की रोकथाम और नगरीय व्यवस्था का आधार यही कर्मी हैं। सम्मान समारोहों की अपनी उपयोगिता है, क्योंकि वे समाज की नज़र में इन कर्मियों की हैसियत बदलने में मदद करते हैं। 

सीएम योगी ने सबसे पहले उस समस्या को निशाना बनाया जो आउटसोर्सिंग व्यवस्था का सबसे बड़ा रोग रही है। ठेकेदारों और एजेंसियों की लंबी श्रृंखला में कर्मचारी की मेहनत की कमाई का एक हिस्सा अक्सर बीच में ही गायब हो जाता है। मुख्यमंत्री ने इसका समाधान यूपी आउटसोर्स सेवा निगम के रूप में सामने रखा, जिसके माध्यम से 16 हजार रुपये न्यूनतम मानदेय की गारंटी दी जा रही है। बिचौलियों को हटाकर एक जवाबदेह संस्था के जरिये भुगतान की व्यवस्था सही दिशा में उठाया गया कदम है, क्योंकि जवाबदेही के बिना कोई भी वेतन गारंटी कागजी रह जाती है।
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भारतीय समाज सदियों से जातिगत पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहा है। वाल्मीकि समाज और अन्य वंचित समुदायों के लोगों को सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ा है। जब सरकार वाल्मीकि जयंती के अवसर पर इस वर्ग के आर्थिक और सामाजिक सशक्तीकरण की बात करती है, तो उसका महत्व इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। 

स्वच्छता सेनानियों के प्रति संवेदना व्यक्त करना आसान है, उसे नीति और व्यवस्था में बदलना कठिन। मुख्यमंत्री ने पहला काम कर दिखाया है और दूसरे की दिशा भी निर्धारित कर दी है। अब जिम्मेदारी उस प्रशासनिक मशीनरी की है, जिसे इस संकल्प को हर कर्मचारी तक पहुंचाना है।  


(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक लालजी निर्मल उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हैं।)
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