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Ghaziabad News: 14.38 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूर्व बैंक प्रबंधक को अग्रिम जमानत
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गाजियाबाद। 14.38 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की मिड कॉरपोरेट शाखा गाजियाबाद की पूर्व मुख्य प्रबंधक और शाखा प्रमुख शेफाली शर्मा को विशेष सीबीआई/ईडी अदालत से राहत मिल गई है। अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत अर्जी स्वीकार करते हुए एक लाख रुपये के निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया है।
सीबीआई की मूल जांच में श्रीआरआर पाइप्स को बैंक से मिली ऋण सुविधाओं और रकम को दूसरी संस्थाओं में भेजने में फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर ऋण लेने, फर्जी बैलेंस शीट और वित्तीय विवरण प्रस्तुत करने और ऋण की रकम अन्य संस्थाओं में भेजने के आरोप लगाए गए थे। सीबीआई के अनुसार मूल 10 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट सुविधा की प्रक्रिया और संस्तुति 29 दिसंबर 2015 को हुई थी।
मार्च 2016 में 2.5 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सुविधा दी गई, नवंबर 2016 में सीमा बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये कर दी गई। अदालत के अनुसार शेफाली शर्मा ने 22 मई 2017 को शाखा का कार्यभार संभाला था। बचाव पक्ष ने कहा कि ऋण और उसकी सीमा बढ़ाने की प्रक्रिया इससे पहले पूरी हो चुकी थी और उनके पास उच्च राशि वाले कॉरपोरेट ऋण को स्वतंत्र रूप से मंजूर करने की शक्ति नहीं थी।
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बचाव पक्ष के अनुसार उन्होंने बाद में जांच के दौरान अनियमितताएं पकड़ीं और 27 नवंबर 2017 से उच्च अधिकारियों को लिखित रिपोर्ट के जरिए जानकारी दी। वहीं ईडी का आरोप है कि 22 मई 2017 के बाद शेफाली शर्मा ने सह आरोपी अंकित तोमर के साथ श्री आरआर पाइप्स के पक्ष में पांच करोड़ रुपये की अतिरिक्त कैश क्रेडिट सुविधा की प्रक्रिया और संस्तुति की।
जांच एजेंसी के मुताबिक इसी दौरान जरूरी जांच नहीं की गई और असत्यापित बैलेंस शीट स्वीकार की गई। ईडी ने आरोप लगाया कि कथित लापरवाही और अन्य कार्रवाइयों के कारण 3.70 करोड़ रुपये से संबंधित संस्थाओं को भेजे गए और अपराध से प्राप्त रकम कुल 14.38 करोड़ रुपये आंकी गई। अदालत ने माना कि शेफाली शर्मा को जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया।
वह ईडी के समन पर उपस्थित होती रहीं और दस्तावेज व जवाब उपलब्ध कराती रहीं। जांच पूरी हो चुकी है और 20 मार्च 2026 को अभियोजन शिकायत दाखिल की जा चुकी है। अदालत ने दो जुलाई 2026 को मामले का संज्ञान लिया था। बैंक रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेज जांच एजेंसी तथा अदालत के कब्जे में हैं।
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सीबीआई की मूल जांच में श्रीआरआर पाइप्स को बैंक से मिली ऋण सुविधाओं और रकम को दूसरी संस्थाओं में भेजने में फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर ऋण लेने, फर्जी बैलेंस शीट और वित्तीय विवरण प्रस्तुत करने और ऋण की रकम अन्य संस्थाओं में भेजने के आरोप लगाए गए थे। सीबीआई के अनुसार मूल 10 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट सुविधा की प्रक्रिया और संस्तुति 29 दिसंबर 2015 को हुई थी।
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मार्च 2016 में 2.5 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सुविधा दी गई, नवंबर 2016 में सीमा बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये कर दी गई। अदालत के अनुसार शेफाली शर्मा ने 22 मई 2017 को शाखा का कार्यभार संभाला था। बचाव पक्ष ने कहा कि ऋण और उसकी सीमा बढ़ाने की प्रक्रिया इससे पहले पूरी हो चुकी थी और उनके पास उच्च राशि वाले कॉरपोरेट ऋण को स्वतंत्र रूप से मंजूर करने की शक्ति नहीं थी।
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बचाव पक्ष के अनुसार उन्होंने बाद में जांच के दौरान अनियमितताएं पकड़ीं और 27 नवंबर 2017 से उच्च अधिकारियों को लिखित रिपोर्ट के जरिए जानकारी दी। वहीं ईडी का आरोप है कि 22 मई 2017 के बाद शेफाली शर्मा ने सह आरोपी अंकित तोमर के साथ श्री आरआर पाइप्स के पक्ष में पांच करोड़ रुपये की अतिरिक्त कैश क्रेडिट सुविधा की प्रक्रिया और संस्तुति की।
जांच एजेंसी के मुताबिक इसी दौरान जरूरी जांच नहीं की गई और असत्यापित बैलेंस शीट स्वीकार की गई। ईडी ने आरोप लगाया कि कथित लापरवाही और अन्य कार्रवाइयों के कारण 3.70 करोड़ रुपये से संबंधित संस्थाओं को भेजे गए और अपराध से प्राप्त रकम कुल 14.38 करोड़ रुपये आंकी गई। अदालत ने माना कि शेफाली शर्मा को जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं किया गया।
वह ईडी के समन पर उपस्थित होती रहीं और दस्तावेज व जवाब उपलब्ध कराती रहीं। जांच पूरी हो चुकी है और 20 मार्च 2026 को अभियोजन शिकायत दाखिल की जा चुकी है। अदालत ने दो जुलाई 2026 को मामले का संज्ञान लिया था। बैंक रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेज जांच एजेंसी तथा अदालत के कब्जे में हैं।