{"_id":"6a86fa2c3fe9d7729a0d53fb","slug":"consensual-relationships-between-adults-are-akin-to-marriage-family-or-friends-cannot-interfere-high-court-delhi-ncr-news-c-340-1-del1011-151426-2026-08-20","type":"story","status":"publish","title_hn":"वयस्कों का सहमति संबंध विवाह के समान, परिवार या मित्र हस्तक्षेप नहीं कर सकते : हाईकोर्ट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
वयस्कों का सहमति संबंध विवाह के समान, परिवार या मित्र हस्तक्षेप नहीं कर सकते : हाईकोर्ट
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि सहमति से रहने वाले दो वयस्क व्यक्तियों का सहमति संबंध विवाह के समान है। ऐसे जोड़े के जीवनसाथी चुनने और साथ रहने के अधिकार में न तो माता-पिता और न ही मित्र हस्तक्षेप कर सकते हैं और न ही उनकी जान को खतरा पहुंचा सकते हैं। न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने 13 अगस्त को एक सहमति संबंध कपल की याचिका पर यह आदेश पारित किया। अदालत ने लड़की के परिवार की तरफ से धमकियों का सामना कर रहे जोड़े को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सहमति से रहने वाले वयस्क जोड़े को अपनी पसंद के साथी के साथ रहने और जीवन जीने का पूरा अधिकार है। इसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।
न्यायमूर्ति बनर्जी ने अपने आदेश में कहा कि सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों के लिए जाति, पंथ, रंग, धर्म या आस्था कोई बाधा नहीं बन सकती। संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रहों के आधार पर सीमित करना व्यक्ति की व्यक्तिगत पहचान को छीनने के समान है। अदालत ने जोर दिया कि वयस्क होने के नाते जोड़े को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और उसके साथ रहने का अधिकार है। परिवार या समाज के दबाव में इस अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंद के अधिकार को सामाजिक रुढ़ियों से ऊपर रखा जाना चाहिए।
विज्ञापन
नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि सहमति से रहने वाले दो वयस्क व्यक्तियों का सहमति संबंध विवाह के समान है। ऐसे जोड़े के जीवनसाथी चुनने और साथ रहने के अधिकार में न तो माता-पिता और न ही मित्र हस्तक्षेप कर सकते हैं और न ही उनकी जान को खतरा पहुंचा सकते हैं। न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने 13 अगस्त को एक सहमति संबंध कपल की याचिका पर यह आदेश पारित किया। अदालत ने लड़की के परिवार की तरफ से धमकियों का सामना कर रहे जोड़े को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सहमति से रहने वाले वयस्क जोड़े को अपनी पसंद के साथी के साथ रहने और जीवन जीने का पूरा अधिकार है। इसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।
न्यायमूर्ति बनर्जी ने अपने आदेश में कहा कि सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों के लिए जाति, पंथ, रंग, धर्म या आस्था कोई बाधा नहीं बन सकती। संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को सामाजिक नैतिकता और पूर्वाग्रहों के आधार पर सीमित करना व्यक्ति की व्यक्तिगत पहचान को छीनने के समान है। अदालत ने जोर दिया कि वयस्क होने के नाते जोड़े को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और उसके साथ रहने का अधिकार है। परिवार या समाज के दबाव में इस अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पसंद के अधिकार को सामाजिक रुढ़ियों से ऊपर रखा जाना चाहिए।
विज्ञापन