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विरोध और अनुमति: प्रशासन के तर्क अपनी जगह, क्या हर समस्या का समाधान प्रदर्शन की जगह बदल देना है?
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कानून-व्यवस्था, सुरक्षा और यातायात संबंधी प्रशासन के तर्क अपनी जगह हैं, लेकिन क्या हर समस्या का समाधान प्रदर्शन की जगह बदल देना है?
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जंतर-मंतर पर अब नहीं होंगे प्रदर्शन
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
अगर हर बार अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने से पहले यह सोचना पड़े कि सरकार इसकी इजाजत देगी या नहीं, तो क्या हम आजादी की हवा में सांस ले रहे होते? यह सवाल आज भी उतना ही जरूरी है, बस फर्क सिर्फ इतना है कि कभी हमें अंग्रेजों से अपने अधिकार मांगने पड़ते थे और आज हमारे पास अपना संविधान है। दिल्ली का जंतर-मंतर इसी आवाज का प्रतीक है। यहां किसान आए, छात्र आए, कर्मचारी आए और ऐसे लोग भी आए, जिनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था। जंतर-मंतर की पहचान केवल एक जगह के रूप में नहीं बनी, बल्कि इसलिए बनी, क्योंकि यहां से उठने वाली आवाज देश की सत्ता तक पहुंच सकती थी।
जब जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला सामने आता है, तो सवाल केवल जगह बदलने का नहीं रह जाता, बल्कि सवाल यह है कि क्या उसकी आवाज सत्ता तक उसी मजबूती से पहुंच पाएगी? प्रशासन कानून-व्यवस्था, सुरक्षा और यातायात का तर्क दे सकता है। लेकिन, क्या हर समस्या का समाधान प्रदर्शन की जगह बदल देना है? क्या यातायात संभालने, भीड़ नियंत्रित करने और सुरक्षा के इंतजाम करने के दूसरे तरीके नहीं हो सकते? प्रदर्शन कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं है, जिसके लिए सुविधानुसार स्थान चुन लिया जाए। उद्देश्य व्यवस्था बनाए रखना होना चाहिए, आवाज को कमजोर करना नहीं। हमारे संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अपनी बात कहने और शांतिपूर्वक बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। सरकार इस पर कुछ उचित प्रतिबंध लगा सकती है, पर प्रतिबंध वे हों, जो बहुत जरूरी हों। केवल यह कह देना कि अनुमति नहीं है, पर्याप्त कारण नहीं होता। अगर किसी को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तो प्रदर्शन लोगों के लिए अपनी समस्या सामने रखने का एक रास्ता बनता है। लेकिन, जब यह रास्ता भी मुश्किल कर दिया जाता है, तो सबसे ज्यादा नुकसान उसी आम आदमी का होता है, जिसके पास अपनी बात पहुंचाने के दूसरे साधन नहीं हैं।
चुनाव जीतना सरकार चलाने का अधिकार देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अगले चुनाव तक जनता अपनी असहमति जताना छोड़ दे। इसके लिए सबसे पहले विरोध और विद्रोह के बीच का अंतर समझना जरूरी है। कोई व्यक्ति सरकार की आलोचना कर सकता है, नारे लगा सकता है, धरना दे सकता है या शांतिपूर्ण मार्च निकाल सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह देश या पूरी व्यवस्था के खिलाफ है। विद्रोह में मौजूदा सत्ता या व्यवस्था को बड़े स्तर पर चुनौती देने की कोशिश हो सकती है। कुछ विद्रोह हिंसक भी होते हैं, जबकि कुछ संघर्ष बिना हिंसा के चलते हैं। इसलिए, हर विरोध को विद्रोह कहना गलत है। हां, इस अधिकार के नाम पर हिंसा करना या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना सही नहीं ठहराया जा सकता। अगर लगता है कि किसी प्रदर्शन से जनजीवन प्रभावित होगा, तो सरकार सुरक्षा के इंतजाम कर सकती है। लेकिन, असहमति जताने वालों के लिए मुश्किलें बढ़ाई जाएं, अनुमति की प्रक्रिया लंबी की जाए या उन्हें ऐसे स्थानों पर भेजा जाए, जहां उनकी आवाज का असर कम हो, तो यह केवल व्यवस्था का मामला नहीं रह जाता। यह लोकतंत्र में असहमति के लिए बची जगह का सवाल बन जाता है। (लेखक कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य हैं।)