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राजनीति की बदलती भाषा: सियासत में जब तक नैतिकता रही, तब तक दलों व नेताओं में कुछ ‘शर्म-लिहाज’ बची रही
एक बार सत्तापक्ष के नेता ने विपक्ष के एक नेता को ‘सीआईए’ एजेंट कहा, तो अगले दिन वह एक तख्ती लटका कर ले आए, जिस पर लिखा था, ‘मैं सीआईए एजेंट हूं।’ अधिकांश ने इसे नेता की ‘नाराजी’ नहीं, ‘हाजिरजवाबी’ माना। जब तक राजनीति में नैतिकता रही, तब तक दलों व नेताओं में कुछ ‘शर्म-लिहाज’ बची रही।
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राजनीति में बदल रही भाषा
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट-एआई
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विस्तार
उन्होंने कहा कि अब दिमागी नक्सल बचे हैं...ये मैकाले और मार्क्स की संतानें हैं...ये अफवाह फैलाते हैं...इनसे सावधान रहना है...। इतना कहना था कि अगले दिन एक सीनियर ‘दिमागी नक्सल जी’ भी ताल ठोकने लगे कि ‘मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है...।’ यह सीनियर जी का ‘कॉकरोच क्षण’ था, जो अचानक ‘दिमागी नक्सल क्षण’ में बदल गया था। हाय! जिन पर कभी नक्सलों को निपटाने की जिम्मेदारी थी, वही आज कह रहे हैं कि उन्हें अपने ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है!
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एक चर्चक कहिनः इसे कहते हैं कि ‘बिल्ली थैले से बाहर...।’ एक सीनियर के दिमागी नक्सल होने के गर्व को देख कुछ और नामी ‘दिमागी नक्सल’ नजर आने लगे और कहने लगेः मैं भी ‘दिमागी नक्सल’...मैं भी ‘दिमागी नक्सल’...मैं भी ‘दिमागी नक्सल’...। ये ‘रोल रिवर्सल’ के दिन हैं। ‘नकारात्मक’ ही ‘सकारात्मक’ हुआ जा रहा है। ये राजनीति के प्रस्तावों व प्रस्थापनाओं के बदलने के दिन हैं। ये ‘शर्म’ के ही ‘बेशर्म’ हो जाने के दिन हैं।
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एक बड़े ‘मी लॉर्ड’ जी ने किसी और संदर्भ में किसी को ‘कॉकरोच’ कह दिया, तो जबाव में तुरत एक पूरी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ही बन गई और दिल्ली के ‘जंतर-मंतर’ पर आ बैठी और फिर उनके दबाव में एक दिन ‘न झुकने’ का दावा करने वाली सरकार भी झुक गई। ‘कॉकरोच पार्टी’ की मांगें मानी गईं। मंत्री जी को जाना पड़ा और अब भी सत्ता को जब-तब धमकी मिलती रहती है कि जरूरत पड़ी, तो हम फिर ‘जंतर-मंतर’ पर बैठ जाएंगे...और फिर सब हिलने लगते हैं।
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वे सातवें दशक के दिन थे। तब के सत्ताधारी दल के नेता ने विपक्ष के एक नेता को कह दिया कि वह ‘सीआईए’ का एजेंट है...तो अगले दिन वही नेता अपने गले में एक तख्ती लटका कर ले आए, जिस पर लिखा था, ‘हां, मैं सीआईए एजेंट हूं...।’ यह देख सभी सांसद आनंदित हुए। अधिकांश ने इसे नेता की ‘नाराजी’ नहीं, एक प्रकार की ‘हाजिरजवाबी’ माना। जब तक अपनी राजनीति में नैतिकता रही, तब तक दलों व नेताओं में कुछ-कुछ ‘शर्म-लिहाज’ बची रही। नेताजन कटाक्ष का जवाब प्रति-कटाक्ष से दे सकते थे, तब ऐसे ही उत्तम कोटि के ‘हाजिर जवाब’ हुआ करते थे। लेकिन आज के इस ‘अश्रद्ध’ समय में, सारे ‘नैतिक प्रश्न’ पहले ही कूच कर चुके हैं। अब न शर्म बची है, न लाज-लिहाज।‘ सोशल मीडिया’ के उजड्ड वातावरण में अब न किसी की इज्जत बची है, न आबरू। इसीलिए अब हर बंदा उसी पत्थर को उठाकर बदले में मार देता है, जो पहले किसी ने फेंका था। यह उसी तरह होता है, जिस तरह आज के प्रदर्शनों में पुलिस आंसू गैस के गोले छोड़ती है, तो भीड़ उसी गोले को पुलिस की ओर फेंक देती है। अब दैनिक राजनीति में भी यही तकनीक अपनाई जाने लगी है। इससे एक ओर विरोधी निरुत्तर हो जाता है कि अब क्या करोगे? तो जवाब में उसी पत्थर को उठाकर मारने वाला ‘हीरो’ बन जाता है कि ये लो, मैं वही हूं, जिससे आप ‘हेट’ करते हो। यह ‘आपकी जूती आपके सिर’ का दौर है। यही ‘रोल रिवर्सल’ है। यही ‘प्रस्थापना परिवर्तन’ है।
राजनीति की भाषा बदल गई है और दुनिया भर में बदल गई है। हम इसे हर रोज होते देख सकते हैं। एक ओर सत्ता की भारी-भरकम ‘बिग आइडिया’ वाली भाषा है, तो दूसरी ओर विपक्ष की ‘तू बड़ तू’ वाली भाषा है। एक के पास राष्ट्रवाद का नैरेटिव है, दूसरे के पास ‘मिनिमलिस्ट’ और ‘टुकड़े-टुकड़े वादी, छापामार, ‘शूट एंड स्कूट’ वाला एक ‘अराजकता वादी’ नैरेटिव है। आप उसे एक ‘विशेषण’ में फिक्स करते हैं कि तुम ये हो, तो जबाव में वह कहने लगता हैः ‘हां, मैं ये हूं...तो क्या?...अब मैं ही तुम्हारा विकल्प हूं... तुम बुड्ढे हो, मैं जवान हूं...’ जैसे जवान कभी बुड्ढे नहीं होने वाले। इसे कहते हैं ‘जिद’ को हथियार बनाना। आप कहते हैं कि देशद्रोही है, तो वह कहेगा ‘हां मैं हूं’... ‘आप तो सत्ता में हो, सजा दो न!’ आप कहेंगे कि ‘राष्ट्रविरोधी है’ तो वह कहेगा, ‘हां हूं, लेकिन सिद्ध करो न...’ और आप कुछ कर नहीं सकते। एक तो कानून लचर, फिर न्याय व्यवस्था सुस्त, फिर जनतंत्र में हर पांच साल में वोट की चिंता और हर वोट का किसी जाति या धर्म में होना...। इसलिए हमारे यहां पक्ष-विपक्ष एक-दूसरे पर तरह-तरह के आरोप लगाते रहते हैं, लेकिन आरोपों को प्रायः सिद्ध नहीं कर पाते कि ये रहा इसके देशद्रोही होने का प्रमाण...आरोप सिर्फ आरोप रह जाते हैं और आप देखते रह जाते हैं।
इस क्रम में नया उदाहरण राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के पूरे गाने से जुड़ा है। आप कहते हैं कि ‘वंदे मातरम’ गाओ, तो पूरा गाओ। कानून यही कहता है। यह सब जानते हुए भी कुछ विपक्षी दल कह रहे हैं कि हम पूरा नहीं गाएंगेे। कुछ कह रहे हैं कि हम तो बिल्कुल नहीं गाएंगे, क्योंकि यह हमारे धर्म के विपरीत है। ऐसे में आप क्या करेंगे? क्या सबको जेल में डालेंगे?
राजनीति की यह भाषा पुराने किस्म के ‘आदर्शवाद’ से जुड़ी है, ‘देशप्रेम’ व ‘राष्ट्रवाद’ के ‘पूज्यभाव’ से जुड़ी है। इन दिनों यों भी सत्ता की भाषा में एक खास किस्म का ‘सेवक-सेव्य’ भाव निहित रहता है, जबकि यह समय एक निरा ‘अश्रद्ध और ‘उजड्ड’ समय है, जिसका एक नमूना हमें कुछ पहले जंतर-मंतर पर दी गईं गालियों में और दूसरे संसद के भीतर-बाहर आए दिन व्यक्त की गई ‘तू तड़ाक’ की भाषा में व्यक्त होता दिखा है। समाजों में पुराने किस्म की ‘हाइरार्की’ (पदानुक्रमता) टूट रही है। इन दिनों इस हाइरार्की को तोड़ने वाले संबंध ही आकर्षक लगते हैं और कॉकरोच व विपक्ष के एक हिस्से की भाषा भी ऐसी ही मूर्तिभंजक भाषा है। इसीलिए सत्ता पक्ष की भाषा और विपक्ष की भाषा में संवाद नहीं है। सत्ता की भाषा शालीन और नियमों से बंधी भाषा है, जो जरा भी टूटती है, तो दूसरे को कुछ भी कहने का लाइसेंस दे देती है। इस सत्ता के महाकाय में इन दिनों कुछ ‘चिरचिटे’ चिपक गए हैं, जिनको छुड़ाना बिना नई भाषा के मुश्किल है। ये सब ‘आधुनिकता’ की ‘खोखलें’(डिस्कंटेट्स) हैं। ये ‘आधुनिकता’ की ‘थकान’ की ‘झुर्रियां’ हैं, जिनको ‘जेन-जी’ व ‘कॉकरोच भाव’ की ‘उत्तर आधुनिक भाषा’ भर रही है या विपक्ष की ‘जिद्दी भाषा’ भर रही है। जब तक सत्ता की भाषा इस नई भाषा और विपक्ष की जिद्दी भाषा को नहीं समझती, तब तक वह रक्षात्मक ही रहनी है।