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आज वो जंतर-मंतर नहीं: आंदोलनों के लिए इसका बंद होना सत्याग्रहियों के लिए चिंता की खबर, ऐसे लोगों की संख्या कम
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वास्तविक सत्याग्रहियों के लिए जंतर-मंतर का आंदोलनों के लिए बंद होना वाकई चिंता की खबर है। दीगर बात है कि देश में उनकी संख्या कम ही बची है।
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जंतर-मंतर पर अब नहीं होंगे प्रदर्शन
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
अब जंतर-मंतर दिल्ली में धरना, विरोध प्रदर्शन और आंदोलनों का स्थान नहीं रहा। दिल्ली पुलिस ने डिनोटिफाई करते हुए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को प्रदर्शन और रैली करने के लिए तय किया है। स्वयं उच्चतम न्यायालय ने जंतर-मंतर के बजाय दूसरी जगह का सुझाव दिया था। उसके पहले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जंतर-मंतर पर धरने को प्रदूषण फैलाने वाला माना था। हरित प्राधिकरण के इस फैसले का व्यापक विरोध हुआ और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पहले की तरह होते रहे।
यह जानकारी पहले से थी कि गृह मंत्रालय ने जंतर-मंतर के बजाय लोगों को मांग रखने व धरना प्रदर्शन आदि के उपयुक्त स्थान तय करने के लिए एक समिति का गठन किया। इसी समिति के सुझाव पर यह निर्णय किया गया है। तत्काल वर्तमान निर्णय पर कोई निश्चित मत देना जरा कठिन है। अभी इतना ही कह सकते हैं कि हर विचारधारा के वास्तविक सत्याग्रहियों, एक्टिविस्टों, आंदोलनकारियों, रचनात्मक काम करने वाले या दूसरे शब्दों में संपूर्ण जीवन नि:स्वार्थ भाव से आवश्यकता अनुसार रचना और संघर्ष में लगा देने वाले लोगों के लिए निश्चय ही यह निर्णय थोड़ी चिंता का विषय बना है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में आंदोलनों की प्रकृति को देखते हुए ऐसे लोग स्वयं ही इससे लगभग अलग हो गए थे। वैसे अब इस तरह के लोगों की संख्या देश में अत्यंत कम बची है। पहले सामान्य तरीका हुआ करता था कि कोई भी धरना-प्रदर्शन करना है, तो हम पुलिस के पास एक आवेदन देते थे और सामान्यत: पुलिस उसे स्वीकार करती थी। कार्यक्रम का समय तय होता था। अगर पैदल मार्च करना है, तो उसकी भी अनुमति मिलती थी और जंतर-मंतर से निकलकर संसद मार्ग तक लोग जाते थे, जहां पुलिस रोकती रुक जाते थे। जंतर-मंतर पर एक व्यवस्था मांग पत्र और ज्ञापन देने की भी थी। यही नहीं अगर आपको किसी मंत्री या अधिकारी के समक्ष जाकर बात रखनी हो, तो उसकी व्यवस्था भी कई बार हो जाती थी।
नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध आयोजित शाहीनबाग धरना के साथ देश में धरना-प्रदर्शन और आंदोलन का चरित्र पूरी तरह बदल चुका है। कृषि कानून के विरुद्ध आंदोलन में भी हमने देखा 26 जनवरी, 2021 को प्रदर्शनकारी लाल किले पर चढ़ गए और तिरंगा झंडा तक उतार दिया। लोकतंत्र में अपनी सोच के अनुसार वाजिब -गैर वाजिब किसी भी तरह की मांग या बदलाव के लिए धरना प्रदर्शन या आंदोलन का अधिकार हम सबको है। किंतु उसमें कानून और व्यवस्था का पहलू भी शामिल है।
महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे महान लोगों का नाम तो लेते हैं, लेकिन इन विभूतियों ने उग्रता और हिंसा की बात तो छोड़िए, कभी किसी के संदर्भ में असभ्य और अमर्यादित शब्दों तक का प्रयोग नहीं किया। आंदोलनों में उग्र भाषा का प्रयोग होता रहा है, लेकिन व्यवहार की एक मर्यादा भी बनी रही। जहां ये टूटी, वहां पुलिस प्रशासन को कानून व्यवस्था के नाम पर कार्रवाई करने का अवसर मिला।
संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली के चरित्र में कोई परिवर्तन अचानक नहीं आता। मांगों के बारे में आश्वासन दिया जाता है और फिर प्रक्रिया के तहत पूरी होती हैं। इतनी समझदारी मांग करने वालों के अंदर होनी चाहिए। अब तो ऐसा लगता है कि धरना शुरू किया और मांगंे पूरी हों, नहीं तो फिर कोहराम मचा देंगे। इसलिए पुलिस प्रशासन के लिए कुछ ही रास्ते बचते हैं या तो आंदोलनकारियों को उपयुक्त स्थान पर पहुंचने न दें, उन्हें समय से पहले हिरासत में ले लें, गिरफ्तार कर लें या फिर वह नहीं माने तो इसके आगे का कदम उठाएं।
जंतर - मंतर ऐसी जगह थी, जहां से संसद, वर्तमान पुलिस मुख्यालय, सारे मंत्रालय, पूरा कर्तव्य पथ सब आसपास थे।
ज्ञापन देना आदि आसान होता था। प्रशासन का दायित्व बनता है कि नियोजित मांगों आदि को उपयुक्त स्थान तक पहुंचाने की समुचित व्यवस्था हो। ऐसा संभव नहीं कि किसी व्यवस्था में कोई निर्णय गलत नहीं हो, किसी के साथ अन्याय, अत्याचार नहीं हो और इसीलिए अहिंसक न्यायोचित धरना प्रदर्शन आंदोलन आदि पूरी व्यवस्था के आवश्यक अंग हैं। इनके लिए समुचित स्थल, व्यवस्था एवं अनुकूल ढांचा बनाए रखना सभी सरकारों और प्रशासन का दायित्व है।