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यूपी: सपा-कांग्रेस सीट में शेयरिंग या सफलता का खयाली पुलाव?
सपा प्रमुख अखिलेश यादव का कहना है कि सीटों का बंटवारा जीत की संभावना के हिसाब से तय होना चाहिए न कि आंकड़ेबाजी के आधार पर। जाहिर है कि सपा का लक्ष्य चुनाव जीतना है न कि सीटों को खैरात की तरह बांटना।
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राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अखिलेश यादव।
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
चुनाव के पहले सीटों के बंटवारे को लेकर राजनीतिक दलों में खींचतान और कड़ी सौदेबाजी आम बात है। हर पार्टी चाहती है कि वह चुनाव लड़ने के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करे ताकि चुनाव बाद सत्ता में आने पर वह ज्यादा हिस्सेदारी मांग सके। अपनी राजनीतिक ताकत भी बढ़ा सके।
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अमूमन सीट बंटवारे के लिए कोई न कोई सर्वमान्य फार्मूला तय किया जाता है। इसमें सम्बन्धित पार्टी का जनाधार, सीट जीतने की क्षमता, पिछले चुनावों में मिले वोट या फिर किसी ‘लेन देन’ की नीयत आदि मुख्य कारक हो सकते हैं। लेकिन इन दिनों उत्तर प्रदेश में विपक्ष में बैठी समाजवादी पार्टी और कभी बरसों तक सत्ता में रही और अब हाशिए पर पहुंची कांग्रेस में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर जो खींचतान और सीट शेयरिंग के के दावे प्रति दावे किए जा रहे हैं, वह अपने आप में बेहद दिलचस्प और राजनीतिक सौदेबाजी का एक नया अध्याय है।
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खास बात यह है कि यूपी में 2022 के विधानसभा चुनाव में महज दो सीटें जीतने, चार पर नंबर दो रहने और 2.33 फीसदी वोट पाने वाली कांग्रेस समाजवादी पार्टी से इस बार 180 सीटें तक मांग रही है। जबकि सपा अधिकतम 80 सीटें तक देने पर राजी बताई जाती है।
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सपा प्रमुख अखिलेश यादव का कहना है कि सीटों का बंटवारा जीत की संभावना के हिसाब से तय होना चाहिए न कि आंकड़ेबाजी के आधार पर। जाहिर है कि सपा का लक्ष्य चुनाव जीतना है न कि सीटों को खैरात की तरह बांटना। लेकिन कांग्रेस का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद और राज्य में योगी सरकार के खिलाफ दस वर्षों की एंटी इकम्बेंसी के चलते वह इतनी मजूबत हो चुकी है कि आसन्न विधानसभा चुनाव में वह सपा के लिए तुरूप का इक्का साबित हो सकती है।
कांग्रेस का मानना है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी का जनाधार राज्य में बढ़ा है। खासकर दलित और अल्पसंख्यकों में। यही कारण है कि कांग्रेस ने एक दलित नेता राजेन्द्र पाल गौतम को पार्टी का यूपी प्रभारी बनाया है और इमरान मसूद को राज्य का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। ऐसे में कांग्रेस को ज्यादा सीटें देकर सपा अपना ही भला करेगी।
हालांकि, राजनीतिक प्रेक्षक कांग्रेस के इस अति आशावाद को पुरानी कहावत ‘ तोप का लायसेंस मांगोगे तो तमंचे का तो मिल ही जाएगा’ से जोड़कर देख रहे हैं। यानी 180 सीटें मांगेंगे तो 70-80 मिल ही जाएंगी। फिर चुनाव नतीजा जो हो। यूपी में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं, जो देश में सर्वाधिक हैं। राज्य में विस चुनाव अगले साल मार्च में होने हैं।
यहां तार्किक सवाल यह है कि किसी भी चुनाव में सीटें मांगने या देने का बेस फार्मूला क्या हो? यानी विधानसभा चुनाव के लिए पिछला विस चुनाव परिणाम आधार माना जाए अथवा बीता लोकसभा चुनाव परिणाम बेस माना जाए? क्योंकि दोनो चुनावों की प्रकृति, मुद्दे और मतदाता की सोच अलग-अलग होती है।
हालांकि, कई बार जो नतीजा विस चुनाव में आया, लगभग वही कुछ समय बाद हुए लोकसभा में भी दिखा। लेकिन हमेशा ऐसा हो जरूरी नहीं होता। कभी-कभी वह उलटा भी हो सकता है, यह हम पहले देख चुके हैं। इसलिए सीट बंटवारे का व्यावहारिक फार्मूला पुराने आंकड़ों से ज्यादा वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिस्थति के हिसाब सम्बन्धित पार्टी की हैसियत, जनाधार और जीतने की संभावना के आधार पर होना ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।
जहां तक यूपी की बात है राज्य में इस बार पिछले विस चुनाव की तुलना में राजनीतिक समीकरण बदले हुए हैं। 2022 के विस चुनाव में राज्य में नंबर दो की पार्टी समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय लोकदल और भारतीय समाज पार्टी (सुहेलदेव) से समझौता था। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी 36.6 फीसदी वोट लेकर 111 सीटें जीती थी।
जबकि रालोद और सुहेलदेव भासपा का कुल वोट शेयर 1.73 फीसदी ही था। इसमें रालोद को 8 और सुहेलदेव पार्टी को 6 सीटों पर जीत मिली थी। जबकि कांग्रेस अकेले 399 सीटों पर लड़ी थी और उसे दो सीटों पर जीत हासिल हुई थी। चार सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे थे इस हिसाब से तो कांग्रेस का दावा केवल 6 सीटों का बनता है।
दूसरी तरफ सपा की सहयोगी रही रालोद और सुहेलदेव पार्टी अब भाजपा के साथ एनडीए गठबंधन में हैं। ये पार्टियां भी ज्यादा सीटों के लिए भाजपा पर दबाव बना रही हैं, लेकिन सपा कांग्रेस जैसी रस्साकशी नहीं है।
कांग्रेस अगर 180 सीटें तक मांग रही है तो उसके पीछे तार्किक आधार क्या है? कांग्रेस का मानना है कि आगामी विस चुनाव में सीट बंटवारे के लिए पिछले विस चुनाव परिणामों के बजाए 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों के आंकड़ों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। जब सपा और कांग्रेस मिलकर लड़े और राज्य की कुल 80 लोकसभा सीटों में से क्रमश: सपा 33 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं।
वो प्रतिशत भी सपा का 41.97 और कांग्रेस का 9.53 प्रतिशत रहा। यूपी में वह चुनाव मुख्यत: संविधान बचाने के मुद्दे पर फोकस हो गया था, जिसकी वजह से दलितों ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को बड़ी तादाद में समर्थन दिया। हालांकि यह मुद्दा बाद में धीरे-धीरे ठंडा पड़ता गया। ऐसे में अगले विधानसभा चुनावों में दलितों का रूख क्या रहेगा, यह अभी से कहना मुश्किल है।
जबकि, सपा का यादवों और मुसलमानों में जनाधार अभी भी मजबूत है। हालांकि एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर हैं। उधर कांग्रेस का मानना है कि दलित वोटों पर मायावती की बसपा का लगभग एकाधिकार टूट रहा है और कांग्रेस और कुछ मात्रा में चंद्रशेखर रावण की पार्टी आजाद समाज पार्टी की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
इसके पहले इस वोट बैंक का काफी झुकाव भाजपा की तरफ हो गया था। नतीजतन भाजपा 2017 और 2022 के चुनावों में विजयी रही। लेकिन योगी के नेतृत्व में राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटना टेढ़ी खीर भले न हो, लेकिन चु्नौतीपूर्ण जरूर है। इसका एक फैक्टर राज्य में ब्राह्मण वोटों की भाजपा से कथित नाराजी भी है।
शायद इसीलिए कांग्रेस ने चुनाव से पहले एक ब्राह्मण महिला आराधना मिश्रा को राज्य में पार्टी की कमान सौंपी है। यानी कांग्रेस का कोर वोट, दलित और ब्राह्मण वोटों का समीकरण जम जाए तो पार्टी विस चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर सत्ता की चाभी अपने हाथ में रख सकती हैं। इस सोच का अंकीय आधार यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव विधानसभा सीटवार लीड को देखें तो सपा 183 और कांग्रेस ने 40 विस सीटों पर लीड ली थी।
यही ट्रेंड विस चुनाव में भी कायम रहता है तो सपा कांग्रेस गठबंधन कुल 233 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता में आ सकता है। हालांकि केवल लीड के आधार पर सीट जीतने का विचार सही इसलिए नहीं है कि इस लोस चुनाव में बसपा ने 162 विस सीटों पर बढ़त हासिल की थी, लेकिन उसे लोकसभा की एक भी सीट नहीं मिली।
बहरहाल, राजनीति की दुनिया उम्मीदों पर ज्यादा टिकी होती है बजाए जमीनी हकीकत के। समाजवादी पार्टी अंतिम रूप से कांग्रेस को कितनी विस सीटें देगी, यह तो आगे पता चलेगा। लेकिन लोकसभा चुनाव में बेहतर परफार्मेंस के पीछे सपा का परसेप्शन यह है कि उसकी वजह से ही कांग्रेस ज्यादा सीटे जीत पाने में सफल हो पाई न कि कांग्रेस की वजह से सपा को ज्यादा सीटें मिलीं।
सिर्फ आंकड़ों को आधार मानने में खतरा यह है कि लोस चुनाव की बढ़त के आंकड़े अगर विस चुनाव में भी जीत में न बदले तो कांग्रेस को साथ रखने की चाल बेकार साबित होगी। जबकि कांग्रेस का मानना है कि राज्य में उसकी ताकत बढ़ रही है, लिहाजा वह सपा को भी बेहतर जीत दिलाने में मददगार होगी।
यही फार्मूला अगर सत्तारूढ़ भाजपा व एनडीए पर लागू करके देखा जाए तो राज्य में यह गठबंधन केवल 174 विस सीटों पर ही बढ़त बना सका। यानी वही ट्रेंड रहा तो योगी सरकार का जाना तय है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या विस चुनाव में भी वैसा ही कुछ होगा? क्या मतदाता की सोच बदलेगी या वही रहेगी? क्या चुनावी मुद्दे भी वैसे ही रहेंगे जैसे लोस चुनावों में थे?क्या योगी फैक्टर अभी भी महत्वपूर्ण है या नहीं? इन सवालों के जवाब तो विस चुनाव में ही मिलेंगे। लेकिन खयाली पुलाव भी राजनीतिक पार्टी की एक अहम डिश होती है। उसे पकाने का अधिकार हर किसी को है। कांग्रेस को भी।
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