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एससीओ समिट: मियां शहबाज शरीफ, तस्वीर काटने से हकीकत नहीं बदलती
अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी की मौजूदगी को मिटाने का सबसे आसान तरीका फोटो एडिट करना हो सकता है, लेकिन उसकी राजनीतिक मौजूदगी को मिटाना संभव नहीं है।
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फिर फजीहत करवा बैठा पाकिस्तान
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
कूटनीति अति गंभीर विषय है। इसमें शब्दों का भी वजन होता है और तस्वीरों का भी, लेकिन जब किसी देश की सरकार अंतरराष्ट्रीय मंच की आधिकारिक तस्वीर को इस तरह काट-छांटकर पेश करे कि उसका अपना नेता ज्यादा प्रमुख दिखाई दे तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
बिश्केक में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से साझा की गई एक तस्वीर इसी वजह से चर्चा में आ गई। तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और कुछ अन्य नेताओं को फ्रेम से बाहर कर दिया गया था, जबकि सम्मेलन की मूल तस्वीर में सभी नेता मौजूद थे।
हालांकि, बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पूरी तस्वीर अपने निजी सोशल मीडिया अकाउंट से साझा कर दी। यहां सवाल केवल फोटो एडिट करने का नहीं है। सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश को अपनी जगह साबित करने के लिए तस्वीर काटने की जरूरत क्यों पड़ रही है? तस्वीर काटने से किसी देश का कद बड़ा नहीं होता। किसी नेता को तस्वीर से हटाने से वह अंतरराष्ट्रीय मंच से हट नहीं जाता।
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यह घटना इसलिए भी दिलचस्प है कि मूल तस्वीर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी, यानी जिसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपनी पोस्ट में नहीं दिखाया, उसे दुनिया के दूसरे नेताओं और आधिकारिक स्रोतों ने दिखा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पूरी तस्वीर साझा की, जिसमें शहबाज शरीफ समेत सभी नेता मौजूद थे।
इसके बाद पाकिस्तान की पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे और आलोचना तेज हो गई। बाद में शरीफ ने पूरी तस्वीर साझा कर मामले को संभालने की कोशिश की। यहीं से बात फोटो से आगे निकल जाती है। अगर किसी देश की सरकार को लगता है कि भारत को तस्वीर में दिखाने से उसकी अपनी छवि कमजोर होगी तो यह सोच खुद में काफी कुछ कहती है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी की मौजूदगी को मिटाने का सबसे आसान तरीका फोटो एडिट करना हो सकता है, लेकिन उसकी राजनीतिक मौजूदगी को मिटाना संभव नहीं है।
यह सच है कि भारत-पाकिस्तान संबंधों में लंबे समय से तनाव है। दोनों देशों के बीच युद्ध हुए हैं। आतंकवाद बड़ा विवाद रहा है। सीमा पर लगातार तनाव बना रहा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय से दबाव है। विदेशी कर्ज, महंगाई, ऊर्जा संकट, राजनीतिक अस्थिरता जैसी समस्याएं वहां लगातार चर्चा में रही हैं।
ऐसे माहौल में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता को रोजगार, स्थिरता और बेहतर जीवन देना है। ऐसे समय में सोशल मीडिया पर किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री को तस्वीर से हटा देना शायद घरेलू राजनीति में कुछ लोगों को अच्छा लगे, लेकिन इससे न महंगाई कम होती है और न अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। देश तस्वीरों से नहीं, अपनी आर्थिक और संस्थागत ताकत से बड़ा होता है।
दरअसल, पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में भारत विरोधी राजनीति की भूमिका बहुत बड़ी रही है। 1947 के बाद से दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे। 1948, 1965, 1971 और 1999 में दोनों देश युद्ध लड़ चुके हैं। हर बार पाकिस्तान को शर्मिंदा होना पड़ा। 1971 पाकिस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक था।
पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैन्यकर्मी और अन्य कर्मी युद्धबंदी बने। इतिहास का उद्देश्य किसी समाज को हमेशा अपमानित करना नहीं होता। इतिहास का उद्देश्य यह समझना होता है कि गलतियों से क्या सीखा जाए?
पाकिस्तान के लिए भी यही बात लागू होती है। भारत के खिलाफ लगातार नकारात्मक माहौल बनाकर वह अपनी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से लंबे समय तक ध्यान नहीं हटा सकता।
भारत और पाकिस्तान के व्यापार को लेकर अक्सर बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बातें कही जाती हैं। तथ्य यह है कि भारत ने 15 फरवरी 2019 को पाकिस्तान से सर्वाधिक वरीयता प्राप्त राष्ट्र (एमएफएन) का दर्जा वापस ले लिया था। पाकिस्तान से आने वाले सामान पर 200 प्रतिशत सीमा शुल्क लगाया गया था। अगस्त 2019 में पाकिस्तान ने भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार को निलंबित कर दिया।
अब दोनों देशों के बीच सामान्य व्यापारिक संबंध लगभग ठप हैं। पानी का मुद्दा इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद अप्रैल 2025 में भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला किया। भारत ने पानी को सुरक्षा और आतंकवाद के संदर्भ में देखने का संदेश दिया है। यही बदलाव पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से गंभीर है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद मई 2025 में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। भारत ने इसे आतंकवादी ढांचे के खिलाफ कार्रवाई बताया। इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि भारत अब आतंकवाद के मुद्दे पर केवल बयान जारी करने तक सीमित रहने के बजाय सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर भी जवाब देने को तैयार है।
असल सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपनी जमीन से चलने वाले आतंकवादी ढांचे के खिलाफ विश्वसनीय कार्रवाई करता है? अगर इसका जवाब हां में आता है, तभी दोनों देशों के बीच संबंधों में स्थायी सुधार की कोई संभावना बन सकती है।
भारत की ताकत केवल इस बात में नहीं है कि वह पाकिस्तान से बड़ा देश है। भारत की वास्तविक ताकत उसकी अर्थव्यवस्था, बड़ी घरेलू बाजार क्षमता, तकनीकी क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, डिजिटल ढांचे और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ बढ़ते संबंधों में है।
आईएमएफ के आंकड़े भारत की मजबूत विकास स्थिति को दिखाते हैं। 2026 के लिए आईएमएफ ने भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि करीब 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान दिया है। एक बात स्पष्ट है, भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका अब केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है। ऐसे में किसी एससीओ तस्वीर से भारत के प्रधानमंत्री को काट देने से भारत की भूमिका कम नहीं हो जाती।
एससीओ की तस्वीर काटने की घटना को बहुत बड़ा कूटनीतिक संकट कहना शायद अतिशयोक्ति होगी, लेकिन इसे पूरी तरह मामूली घटना मानकर छोड़ देना भी सही नहीं होगा, क्योंकि यह बताती है कि सोशल मीडिया अब कूटनीति का हिस्सा बन चुका है। सरकारें एक तस्वीर से भी संदेश देने की कोशिश करती हैं।
इसलिए आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट में छोटी-सी गलती भी अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन सकती है। पाकिस्तान के लिए इस घटना में एक आसान सबक है, तस्वीर में किसी को हटाना आसान है, लेकिन दुनिया की राजनीति में किसी देश की भूमिका को हटाना आसान नहीं।
भारत की वास्तविक ताकत किसी फोटो में नहीं है, वह उसकी अर्थव्यवस्था, संस्थाओं, सैन्य क्षमता, तकनीक और दुनिया के साथ बढ़ते संबंधों में है। पाकिस्तान की असली चुनौती भी किसी तस्वीर में नहीं है। वह उसकी अर्थव्यवस्था, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं में है। इसलिए बेहतर होगा कि इस्लामाबाद फोटोशॉप की राजनीति से बाहर निकले। तस्वीर काटने से हकीकत नहीं बदलती। हकीकत बदलने के लिए नीति बदलनी पड़ती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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बिश्केक में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से साझा की गई एक तस्वीर इसी वजह से चर्चा में आ गई। तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और कुछ अन्य नेताओं को फ्रेम से बाहर कर दिया गया था, जबकि सम्मेलन की मूल तस्वीर में सभी नेता मौजूद थे।
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हालांकि, बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पूरी तस्वीर अपने निजी सोशल मीडिया अकाउंट से साझा कर दी। यहां सवाल केवल फोटो एडिट करने का नहीं है। सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश को अपनी जगह साबित करने के लिए तस्वीर काटने की जरूरत क्यों पड़ रही है? तस्वीर काटने से किसी देश का कद बड़ा नहीं होता। किसी नेता को तस्वीर से हटाने से वह अंतरराष्ट्रीय मंच से हट नहीं जाता।
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यह घटना इसलिए भी दिलचस्प है कि मूल तस्वीर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी, यानी जिसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने अपनी पोस्ट में नहीं दिखाया, उसे दुनिया के दूसरे नेताओं और आधिकारिक स्रोतों ने दिखा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पूरी तस्वीर साझा की, जिसमें शहबाज शरीफ समेत सभी नेता मौजूद थे।
इसके बाद पाकिस्तान की पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे और आलोचना तेज हो गई। बाद में शरीफ ने पूरी तस्वीर साझा कर मामले को संभालने की कोशिश की। यहीं से बात फोटो से आगे निकल जाती है। अगर किसी देश की सरकार को लगता है कि भारत को तस्वीर में दिखाने से उसकी अपनी छवि कमजोर होगी तो यह सोच खुद में काफी कुछ कहती है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी की मौजूदगी को मिटाने का सबसे आसान तरीका फोटो एडिट करना हो सकता है, लेकिन उसकी राजनीतिक मौजूदगी को मिटाना संभव नहीं है।
यह सच है कि भारत-पाकिस्तान संबंधों में लंबे समय से तनाव है। दोनों देशों के बीच युद्ध हुए हैं। आतंकवाद बड़ा विवाद रहा है। सीमा पर लगातार तनाव बना रहा है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय से दबाव है। विदेशी कर्ज, महंगाई, ऊर्जा संकट, राजनीतिक अस्थिरता जैसी समस्याएं वहां लगातार चर्चा में रही हैं।
ऐसे माहौल में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता को रोजगार, स्थिरता और बेहतर जीवन देना है। ऐसे समय में सोशल मीडिया पर किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री को तस्वीर से हटा देना शायद घरेलू राजनीति में कुछ लोगों को अच्छा लगे, लेकिन इससे न महंगाई कम होती है और न अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। देश तस्वीरों से नहीं, अपनी आर्थिक और संस्थागत ताकत से बड़ा होता है।
दरअसल, पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में भारत विरोधी राजनीति की भूमिका बहुत बड़ी रही है। 1947 के बाद से दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे। 1948, 1965, 1971 और 1999 में दोनों देश युद्ध लड़ चुके हैं। हर बार पाकिस्तान को शर्मिंदा होना पड़ा। 1971 पाकिस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक था।
पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैन्यकर्मी और अन्य कर्मी युद्धबंदी बने। इतिहास का उद्देश्य किसी समाज को हमेशा अपमानित करना नहीं होता। इतिहास का उद्देश्य यह समझना होता है कि गलतियों से क्या सीखा जाए?
पाकिस्तान के लिए भी यही बात लागू होती है। भारत के खिलाफ लगातार नकारात्मक माहौल बनाकर वह अपनी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं से लंबे समय तक ध्यान नहीं हटा सकता।
भारत और पाकिस्तान के व्यापार को लेकर अक्सर बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बातें कही जाती हैं। तथ्य यह है कि भारत ने 15 फरवरी 2019 को पाकिस्तान से सर्वाधिक वरीयता प्राप्त राष्ट्र (एमएफएन) का दर्जा वापस ले लिया था। पाकिस्तान से आने वाले सामान पर 200 प्रतिशत सीमा शुल्क लगाया गया था। अगस्त 2019 में पाकिस्तान ने भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार को निलंबित कर दिया।
अब दोनों देशों के बीच सामान्य व्यापारिक संबंध लगभग ठप हैं। पानी का मुद्दा इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद अप्रैल 2025 में भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला किया। भारत ने पानी को सुरक्षा और आतंकवाद के संदर्भ में देखने का संदेश दिया है। यही बदलाव पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से गंभीर है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद मई 2025 में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। भारत ने इसे आतंकवादी ढांचे के खिलाफ कार्रवाई बताया। इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि भारत अब आतंकवाद के मुद्दे पर केवल बयान जारी करने तक सीमित रहने के बजाय सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर भी जवाब देने को तैयार है।
असल सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपनी जमीन से चलने वाले आतंकवादी ढांचे के खिलाफ विश्वसनीय कार्रवाई करता है? अगर इसका जवाब हां में आता है, तभी दोनों देशों के बीच संबंधों में स्थायी सुधार की कोई संभावना बन सकती है।
भारत की ताकत केवल इस बात में नहीं है कि वह पाकिस्तान से बड़ा देश है। भारत की वास्तविक ताकत उसकी अर्थव्यवस्था, बड़ी घरेलू बाजार क्षमता, तकनीकी क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, डिजिटल ढांचे और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ बढ़ते संबंधों में है।
आईएमएफ के आंकड़े भारत की मजबूत विकास स्थिति को दिखाते हैं। 2026 के लिए आईएमएफ ने भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि करीब 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान दिया है। एक बात स्पष्ट है, भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका अब केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं है। ऐसे में किसी एससीओ तस्वीर से भारत के प्रधानमंत्री को काट देने से भारत की भूमिका कम नहीं हो जाती।
एससीओ की तस्वीर काटने की घटना को बहुत बड़ा कूटनीतिक संकट कहना शायद अतिशयोक्ति होगी, लेकिन इसे पूरी तरह मामूली घटना मानकर छोड़ देना भी सही नहीं होगा, क्योंकि यह बताती है कि सोशल मीडिया अब कूटनीति का हिस्सा बन चुका है। सरकारें एक तस्वीर से भी संदेश देने की कोशिश करती हैं।
इसलिए आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट में छोटी-सी गलती भी अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन सकती है। पाकिस्तान के लिए इस घटना में एक आसान सबक है, तस्वीर में किसी को हटाना आसान है, लेकिन दुनिया की राजनीति में किसी देश की भूमिका को हटाना आसान नहीं।
भारत की वास्तविक ताकत किसी फोटो में नहीं है, वह उसकी अर्थव्यवस्था, संस्थाओं, सैन्य क्षमता, तकनीक और दुनिया के साथ बढ़ते संबंधों में है। पाकिस्तान की असली चुनौती भी किसी तस्वीर में नहीं है। वह उसकी अर्थव्यवस्था, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं में है। इसलिए बेहतर होगा कि इस्लामाबाद फोटोशॉप की राजनीति से बाहर निकले। तस्वीर काटने से हकीकत नहीं बदलती। हकीकत बदलने के लिए नीति बदलनी पड़ती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।