Dirty Politics In India: सियासत में ये दाग अच्छे नहीं हैं, हम्माम में सब नंगे हैं
ऐसा नहीं कि राजनीति के दागियों पर नकेल की पहले से कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है। अभी आपराधिक मामलों में 2 वर्ष की सजा की सूरत में इनकी सदस्यता रद्द होने का प्रावधान है। हालांकि पिछले दिनों इसका भी काट ढूंढ लिया गया।
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यह महज संयोग नहीं कि सियासत में जब-जब शुचिता पर बहस छिड़ी है, तब-तब दागदार दामन वालों का दबदबा और बढ़ता चला गया। अब तो हालात यह हैं कि आपराधिक या भ्रष्टाचार के मामलों में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री को भी दायरे में लाने पर बहस छिड़ गई है।
सुप्रीम कोर्ट में न्यायमित्र की ओर से जो ताजा आंकड़े पेश किए गए हैं, वह चौंकाने वाले हैं। इस लोकसभा के चुने गए 542 सांसदों में से 251 के दामन पर दाग है। इनमें से लोकसभा के 170 सांसदों पर गंभीर आपराधिक मामले हैं। इसी तरह राज्यसभा में 233 में से 75 दागी हैं जिनमें से 40 पर गंभीर आपराधिक मामले हैं।
मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक मामले
सांसदों की बात छोड़ दीजिए, देश के 28 में से 14 मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक मामले हैं। तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी पर सबसे ज्यादा 89 आपराधिक मामले हैं। उसके बाद पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी पर 29 और कर्नाटक के सीएम डीके शिवकुमार पर 19 आपराधिक मामले दर्ज हैं।
केरल इकलौता ऐसा राज्य है, जहां के 20 में से 19 सांसद दागी हैं। इसके बाद तमिलनाडु में 39 में से 26 सांसद, तेलंगाना में 17 में से 14 सांसद, ओडिशा में 21 में से 16 सांसद, झारखंड में 14 में से 10 सांसदों पर आपराधिक दाग हैं। समूचे देश में इस समय सांसदों-विधायकों से जुड़े 4,192 आपराधिक मामले लंबित हैं। नेताओं के आपराधिक मामलों के निपटारे में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बावजूद औसतन जितने मामलों का निपटारा होता है, उतने ही नये मामले जुड़ जाते हैं। पिछले साल 1,243 मामलों का निपटारा हुआ और 1,050 नये मामले जुड़ गए।
दागी सांसदों की बड़ी संख्या
एमपी-एमएलए कोर्ट में तेज सुनवाई की कोशिशों के बावजूद मामलों में कोई कमी नहीं आई । 2018 में कुल 4,122 मामले थे। 2020 में यह बढ़कर संख्या 4,859 हो गई। दागी सांसदों की संख्या भी साल-दर-साल बढ़ती चली गई। 2009 में दागी सांसदों की संख्या 162 थी।
2014 में यह संख्या बढ़कर 185 हो गई। 2019 में 233 हुई और अब 2024 की लोकसभा में यह संख्या 251 तक पहुंच गई है। सफेद झकझक खादी पर दागदार दामन वाले दागी नेता अधिकांश दलों में हैं। भाजपा में 94, कांग्रेस में 49, सपा में 21 और क्षेत्रीय दलों तृणमूल, द्रमुक, तेदेपा, शिवसेना में कई दागी हैं।
दागदारों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध की अर्जी
ताजा सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने माना कि राजनीति में अपराधीकरण जैसे नासुर के लिए लिए बड़ी सर्जरी की जरूरत है। अभी सुप्रीम कोर्ट में एक मामला विचाराधीन है जिसमें अर्जी लगाई गई है कि दागदारों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगे। इस संबंध में प्रारंभिक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, केंद्र व राज्यों से पक्ष जानना चाहा है।
ऐसा नहीं कि राजनीति के दागियों पर नकेल की पहले से कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है। अभी आपराधिक मामलों में 2 वर्ष की सजा की सूरत में इनकी सदस्यता रद्द होने का प्रावधान है। हालांकि पिछले दिनों इसका भी काट ढूंढ लिया गया।
जेल से राजनीति करते मंत्री
बिहार में जब लालू प्रसाद के दामन पर चारा घोटाले का दाग लगा तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को गद्दी पर बैठा दिया और जेल से ही सरकार चलाते रहें। इसी तरह जब शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल पर शिकंजा कसा तो उन्होंने इस्तीफा न देकर जेल से ही कुछ दिनों तक सरकार चलाई और बाद में आतिशी को सीएम का चेहरा बनाकर अपनी और आप (आम आदमी पार्टी) की सियासी आतिशी पारी जारी रखी। तमिलनाडु में सैंथिल बालाजी बिना मंत्रालय (विभाग) के ही मंत्री बने रहे और अंततः सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।
जयललिता के जमाने से शुरू हुई परंपरा
दरअसल, इस परंपरा की बुनियाद जयललिता के जमाने में ही रख दी गई थी। 2014 में सीएम रहते हुए जयललिता अदालत से दोषी ठहराई गईं। गिरफ्तार हुईं। जेल जाने के बाद उन्होंने पन्नीरसेल्वम को विरासत सौंप दी। हालांकि, जेल मैन्युअल भी जेल से सरकार चलाने, कैबिनेट की बैठक बुलाने या फाइलों पर हस्ताक्षर करने की आजादी नहीं देता। यही वजह है कि मजबूरी में इन्होंने किसी और चेहरे की तलाश की जो चेहरा-मोहरा तो बने लेकिन सत्ता की चाबी खुद इन आकाओं के हाथों में रही।
सियासत में शुचिता
राजनीति में शुचिता के लिए आजादी की 75वीं वर्षगांठ या अमृत काल में यह व्यवस्था की गई कि सरकारें खुद नेताओं के आपराधिक मामले वापस नहीं लेंगीं। इसके लिए हाईकोर्ट या एमपी-एमएलए कोर्ट की मंजूरी जरूरी है। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 76 और कर्नाटक में 61 मामले सरकार ने वापस लिए।
चुनाव आयोग ने सियासत में शुचिता के लिए उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की व्यवस्था कर रखी है। इसके बाद भी कुछ उम्मीदवारों पर हकीकत छुपाने का आरोप लगता रहा है। चुने गए ऐसे नेताओं पर चुनाव आचार संहिता डंडा मामूली ही चला। गणतंत्र की जननी वैशाली वाले प्रदेश बिहार में 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना मामले में ऐसे ही 9 दलों को दोषी ठहराया और 8 पर जुर्माना लगाया था।
130 वें संविधान संशोधन विधेयक
सियासत में शुचिता के इसी संकट को देखते हुए अब 130 वें संविधान संशोधन विधेयक के जरिये एक पहल यह की जा रही है यदि गंभीर अपराध या भ्रष्टाचार के मामले में पीएम, सीएम या कोई जनप्रतिनिधि 30 दिन तक हिरासत या जेल में रहते हैं, तो 31 वें दिन उन्हें स्वतः पद से हटना होगा। हालांकि इस मसौदे के पक्ष-विपक्ष में भी बहस छिड़ गई है।
इस व्यवस्था की वकालत कर रहे सत्ता पक्ष की ओर से दावे किए जा रहे हैं कि राजनीति में गलत तत्वों में खौफ बढ़ेगा और साफ-सुथरी राजनीति की ओर कदम बढ़ेंगे। दूसरी तरफ, विपक्ष की दलील है कि ऐसे में तो किसी भी चुनी गई सरकार को सलाखों के पीछे डालकर बदले की राजनीति के तहत परेशान किया जा सकता है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह प्रावधान संविधान के ढांचे और राज्यों के खिलाफ होगा। दरअसल, राजनीति में उसकी कमीज, हमारी कमीज से सफेद कैसे और लाउंड्री-वाशिंग मशीन वाली सियासत का एक नया दौर शुरू हो चुका है। दूसरों के दाग अच्छे नहीं लगते लेकिन वही दाग खुद पर दिखते तक नहीं।
लोकतंत्र को कमजोर कर रहा काला धन
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया में सुधार को लेकर एक मामले की सुनवाई के दौरान यहां तक कहा कि कालाधन लोकतंत्र को कमजोर करता है। मतदाताओं को रिझाने या प्रभावित करने के लिए धन-बल का इस्तेमाल करना गलत है। व्यवस्था दी कि बरामद नकदी या संपत्ति का खुलासा एजेंसियां 24 घंटे के भीतर सार्वजनिक करें। तीन महीने में जांच रिपोर्ट पेश हो। एक साल के भीतर जांच पूरी कर कार्रवाई की जाए। हाईकोर्ट विशेष अदालतें गठित करें और मामलों का तेजी से निपटारा करे।
चुनाव से पहले नकदी व संपत्ति की जब्ती
अब जरा आंकड़ों पर गौर करें। पिछले लोकसभा चुनाव तारीखों के एलान के बाद से रोजाना करीब सौ करोड़ रुपये मूल्य की नकदी व संपत्ति की जब्ती हुई। 2024 में कुल जब्ती 4,650 करोड़ रुपये मूल्य की थी जो 2019 में 3,475 करोड़ थी। 2024 आते-आते चुनाव के दौरान जब्ती का 75 साल का रिकॉर्ड टूट गया। यह भी दर्शाता है कि जितनी नकेल कसी गई, उतना सब कुछ बेलगाम होता गया।
सियासत में शुचिता को लेकर सवाल उठाने वाले अधिकांश दल जिताऊ उम्मीदवारों को मैदान में उतारते रहें। धन-बल व जात-पात के तहत सियासी शतरंज की बिसात बिछती रहीं। मोहरें खोज-खोज कर लाए गए। कालाधन जब्ती के आंकड़ों में उछाल आया, वहीं चुनाव के दौरान लोकलुभावन घोषणाओं की बौछार होती रही। कुछ राज्यों में सरकार बनने के बाद वादे पूरे नहीं हो पाए। मुफ्त रेवड़ियों को पूरी करने में सरकारी खजाना खाली होता गया। विकास का पहिया थम गया। कर्मचारियों-अधिकारियों के वेतन तक के लाले पड़ गए। विकास और रोजगार का चक्र प्रभावित हुआ। मतदाता भी तत्काल होने वाले फायदे के लिए इस वादे (मुफ्त रेवड़ी ) के मकड़जाल में उलझते रहे।
कब बदलेगी राजनीति की सूरत
ऐसे में सवाल उठता है कि सियासत में शुचिता के लिए आखिर कब तक चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट का चाबुक चलता रहेगा। अब राजनीतिक दलों, नेताओं, मतदाताओं, संवैधानिक संस्थाओं खासतौर से चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, कार्यपालिका, न्यायपालिका से सामूहिक प्रयास के बगैर सूरत बदलने की उम्मीद बेमानी है। यदि सब कुछ राम-भरोसे ही रहा तो जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए इस सबसे बड़े लोकतंत्र में ये सियासी दाग आगे भी लगते रहेंगे क्योंकि इस हमाम में सब नंगे हैं।
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