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दूसरा पहलू: मशीनों की चौपाल बनता इंटरनेट
Tue, 25 Aug 2026 06:43 AM IST
निर्मल कांत
मुकुल श्रीवास्तव
मुकुल श्रीवास्तव
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 25 Aug 2026 06:43 AM IST
आज जेनरेटिव एआई और स्वचालित बोट्स के अनियंत्रित प्रसार ने 21वीं सदी के ‘डिजिटल चौपाल’ के मूल स्वरूप को बदलकर रख दिया है।
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इंटरनेट
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
21वीं सदी के शुरुआती दशकों में जब इंटरनेट का विस्तार हुआ, तो इसे सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी ‘डिजिटल चौपाल’ कहा गया। यह ऐसा लोकतांत्रिक मंच था, जहां इन्सान अपनी अनुभूतियां, विचार, कला और मौलिक साहित्य को साझा कर सकता था। लेकिन, आज जेनरेटिव एआई और स्वचालित बोट्स के अनियंत्रित प्रसार ने इस चौपाल के मूल स्वरूप को बदलकर रख दिया है। समाजशास्त्रियों व तकनीकी विश्लेषकों के बीच आज जिस थ्योरी की सबसे गंभीर चर्चा है, वह है-‘डेड इंटरनेट थ्योरी’ यानी ‘मृत इंटरनेट सिद्धांत’।
इसकी अवधारणा पहली बार 2021 में ‘इल्यूमिनती पाइरेट’ नाम के अनाम विचारक ने पेश की थी। बाद में अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक में पत्रकार केटलिन टिफनी के लेख से इसे वैश्विक पहचान मिली। ‘डेड इंटरनेट थ्योरी’ का मूल विचार यह है कि 2016-2017 के बाद से इंटरनेट अपनी जीवंतता खो चुका है। जेनरेटिव एआई के आगमन के बाद स्थिति यह हो गई है कि इंटरनेट अब ‘रोबोटिक कचरे का गोदाम’ बन चुका है, जहां अब बहुत कुछ पहले से तय होता है। दरअसल, एआई एल्गोरिदम हर विषय का एक ‘औसत’ निकालता है और वही औसत ज्ञान हर स्क्रीन पर परोस दिया जाता है। इस मशीनी कचरे के ढेर में किसी लेखक के मौलिक विचार, पत्रकार की जमीनी रिपोर्टिंग या विचारक का अनूठा कोण तब तक दफन रहेगा, जब तक वह इंटरनेट के एल्गोरिदम में नहीं आएगा।
साइबर सुरक्षा फर्म इंप्रेवा द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, आज इंटरनेट के कुल वेब ट्रैफिक का 49.6 फीसदी हिस्सा बोट्स द्वारा संचालित होता है। इसमें से 32 प्रतिशत ट्रैफिक ‘बैड बोट्स’ का है, जो फर्जी लाइक्स, कमेंट्स और स्पैम के लिए जिम्मेदार हैं। यूरोपोल की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2026 तक इंटरनेट पर उपलब्ध कुल ऑनलाइन कंटेंट का नब्बे प्रतिशत हिस्सा एआई द्वारा जनरेटेड हो सकता है। न्यूजगार्ड के हालिया अध्ययन के मुताबिक, इंटरनेट पर ऐसी सैकड़ों 'एआई-जनरेटेड कंटेंट फार्म' वेबसाइट्स सक्रिय हो गई हैं, जो बिना किसी इन्सानी संपादन के हर दिन हजारों फर्जी और सतही लेख पोस्ट करती हैं, ताकि वे विज्ञापनों से कमाई कर सकें।
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‘डेड इंटरनेट थ्योरी’ चेताती है कि इंटरनेट को मशीनों की चौपाल बनने से रोकने के लिए इन्सान को अपनी सोचने, सहेजने और लिखने की मौलिक क्षमता को दोबारा अपने हाथ में लेना होगा।
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इसकी अवधारणा पहली बार 2021 में ‘इल्यूमिनती पाइरेट’ नाम के अनाम विचारक ने पेश की थी। बाद में अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक में पत्रकार केटलिन टिफनी के लेख से इसे वैश्विक पहचान मिली। ‘डेड इंटरनेट थ्योरी’ का मूल विचार यह है कि 2016-2017 के बाद से इंटरनेट अपनी जीवंतता खो चुका है। जेनरेटिव एआई के आगमन के बाद स्थिति यह हो गई है कि इंटरनेट अब ‘रोबोटिक कचरे का गोदाम’ बन चुका है, जहां अब बहुत कुछ पहले से तय होता है। दरअसल, एआई एल्गोरिदम हर विषय का एक ‘औसत’ निकालता है और वही औसत ज्ञान हर स्क्रीन पर परोस दिया जाता है। इस मशीनी कचरे के ढेर में किसी लेखक के मौलिक विचार, पत्रकार की जमीनी रिपोर्टिंग या विचारक का अनूठा कोण तब तक दफन रहेगा, जब तक वह इंटरनेट के एल्गोरिदम में नहीं आएगा।
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साइबर सुरक्षा फर्म इंप्रेवा द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, आज इंटरनेट के कुल वेब ट्रैफिक का 49.6 फीसदी हिस्सा बोट्स द्वारा संचालित होता है। इसमें से 32 प्रतिशत ट्रैफिक ‘बैड बोट्स’ का है, जो फर्जी लाइक्स, कमेंट्स और स्पैम के लिए जिम्मेदार हैं। यूरोपोल की हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2026 तक इंटरनेट पर उपलब्ध कुल ऑनलाइन कंटेंट का नब्बे प्रतिशत हिस्सा एआई द्वारा जनरेटेड हो सकता है। न्यूजगार्ड के हालिया अध्ययन के मुताबिक, इंटरनेट पर ऐसी सैकड़ों 'एआई-जनरेटेड कंटेंट फार्म' वेबसाइट्स सक्रिय हो गई हैं, जो बिना किसी इन्सानी संपादन के हर दिन हजारों फर्जी और सतही लेख पोस्ट करती हैं, ताकि वे विज्ञापनों से कमाई कर सकें।
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‘डेड इंटरनेट थ्योरी’ चेताती है कि इंटरनेट को मशीनों की चौपाल बनने से रोकने के लिए इन्सान को अपनी सोचने, सहेजने और लिखने की मौलिक क्षमता को दोबारा अपने हाथ में लेना होगा।